Sunday, June 17, 2012

आंकड़ों के खेल में व्यस्त है देश के नेता , इस गणित के घटा जोड़ में उलझ गया है मेरा देश !
चुनाव हो या राष्ट्रपति , इन आंकड़ों के बदलते हर गुणा-भाग में फँस गया है मेरा देश !!!
विकास के आंकड़े कब का भूल गए , योजनायों के गणित फाईलों में खो गए ,
कुर्सियों की पाठशाला है , यहाँ के गठजोड़ो की गणित में "शुन्य" हो गया है मेरा देश !!!!


Saturday, May 5, 2012


मैं खोज रही हूँ " उसको" जो हर जगह व्याप्त है , पर खोज न पायी.
धर्मगुरुयों के द्वार खडी चीखती चिलायी , पर "उसे" खोज न पायी.

धर्मस्थलों की सीढ़ियों पर , व्यवसाव को फैलते देखा.
धर्म के ठेकेदारों को धर्म के नाम पर लूटते देखा .
बड़े बड़े भंडारे देखे , बड़े बड़े अनुष्ठान देखें
वहीँ किसी कोने पर लोगों को दाने दाने पर मरते देखा .

तर्कों में , प्रवचनों में , पाठों में , कृपाओं में ढूंढती रही ,
फिर भी दरबारों में , शिविरों में , "उसे " खोज न पायी.

हर ह्रदय में वह रहता है, पर हर ह्रदय को सिकुड़ता देखा
हर पुण्यों में वह मिलता है , पर हर पाप को बढ़ते देखा
हर जुबान उसकी है , पर हर जुबान को जहर उगलते देखा
हर कण कण में रहनेवाला वह , पर लोगों को भटकते देखा

हर इंसान में बसता है वोह , पर वहां भी उसे खोज न पायी
इस इंसानी बस्ती में , एक अदद इंसान भी खोज न पायी.

Poonam Shukla.
(यह भावनात्मक कविता सामाजिक स्तर पर है. किसी भी धर्म , धर्मगुरु या धर्मस्थल से संबधित नहीं हैं .The poem is on social subjects and does not indicate any specific religion, religious leader/person and Religious place.चित्र केवल साहित्यिक प्रतीकात्मक है .Image is only literary representation)

Sunday, March 11, 2012

Leadership : Rahul Vs Akhilesh :उत्तरप्रदेश चुनाव का नेतृत्व विश्लेषण


"We are not friends, we are just political acquaintances.हम  दोस्त नहीं  है   हम   सिर्फ राजनैतिक परिचित हैं " by Akhilesh on Rahul  while UP byelection Firozabad after defeat of His Wife

कुछ  महीनो पहले  उत्तरप्रदेश में हुए उपचुनाव में   राहुल  गाँधी द्वारा किये गए कांग्रेस प्रचार और कांग्रेस की वापसी का प्रतीक माने जाने वाले  इस उपचुनाव के  नतीजे में अपनी पत्नी डिम्पल   की करारी हार    के बाद  अखिलेश  यादव  ने  युध्ध की  घोषणा कर दी थी .... यह शुरुवात थी  " अखिलेश यादव विरुद्ध  राहुल गाँधी " के महाभारत की जो शायद तब राजनीती के जानकार भी नहीं समझ नहीं पाए . इस करारी शिकस्त ने अखिलेश को मानो बदल दिया हो   और  एक  आग  उनके  मन में लगी हो .


राहुल और अखिलेश :  दोनों ही आधुनिक भारत के यूथ ब्रिगेड , भारत की राजनैतिक विरासत में जन्मे और पले हुए , एक  कांग्रेस के राजकुमार  तो दुसरे समाजवादी पार्टी के युवराज , दोनों ही  उत्तरप्रदेश से सांसद . दोनों के हाथों उनकी पार्टियों के  चुनाव प्रचार की बागडोर . दोनों पर उनके पार्टी नेताओं का विश्वास  और प्रचार में खुली छूट .

अखिलेश की तरह ही राहुल ने अपने पार्टी के चुनाव प्रचार के नेतृत्व  आगे आ कर किया . कई विषम परिस्थितियों में , 22  साल से टूटी , लुप्त हुयी और सत्ता से दूर रही पार्टी को संभाला . उन्होंने भी काफी मेहनत की  200  से ज्यादा मीटिंग्स और दिन रात की यात्राएँ.  

अखिलेश , एक "अपने ही मोहल्ले गल्ली का बच्चा " का रूप लिए जेहां भी गए , और जब से Sept 2011 से उन्होंने साइकिल यात्रा शुरू की , सक्रिय युवकों की भीड़ उन्हें " भैया " कहते हुए जुटने और उमड़ने लगी. अखिलेश ने भले ही अपने भाषणों से कोई आग ना उगली हो  या पंच लाइन नहीं दी हो , लेकिन वे लोगों के हुजूम के बीच रहे , युवको से जिस तरह मिले , उनसे एक अपनापन रिश्ता सा बनाने लगे और उनके साथ पल बिताये , समाजवादी पार्टी की लहर सी बनने लगी .

अखिलेश ने सबसे प्रभावशाली अभियान का संचालन किया था . नियंत्रित पर अति सशक्त . उन्होंने विवेक पर निर्भरता रखी बजाये  भावनायों में बहने के. उन्होंने अपमानजनक या अपघर्षक शब्दों का प्रयोग नहीं किया . राहुल के किसी बी ग्रेड फिल्म की याद दिला देने वाले तमाशे के बिलकुल विपरीत प्रभावशाली प्रर्दशन करते रहे.   उन्होंने  D P यादव को पार्टी में शामिल करने का खुल कर  ; पर बिना क्रोध या अनियंत्रित  विरोध दिखा कर अपने प्रभाव को जाता दिया . उन्होंने किसी वोट  बैंक या आरक्षण को भी खुश करने में वक़्त बर्बाद नहीं किया . 

राहुल के   राष्ट्रीय व्यक्तित्व  की  छवि के  सीधे विपरीत अखिलेश ने जमीन से  जुड़े  होने की छवि का निर्माण किया . राहुल के नकारात्मक प्रचार  जो अधिकतर मायावती सरकार की बुराईयों और अन्याय पर निशाना  भर   था  , अखिलेश ने विकास के मुद्दों पर जोर देते  हुए " मुफ्त लैपटॉप" की बातें कर उत्तरप्रदेश की जनता में चुनावी वातावरण  को नया आयाम , नयी हवा देने की सफल कोशिश की .

भारी सुरक्षा घेरे में बंधे राहुल  , लकड़ी की बाड़ के उस पार जुटे  दर्शकों और भीड़ को मंत्रमुग्ध तो कर देते हैं  पर मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश बिना किसी ढोंग के अपनी  छवि  जनता के बीच उन्ही के गल्ली-मोहल्ले का बच्चा होने की बना लेते हैं  

राहुल में पूरे उत्तरप्रदेश में  भारी जुटी भीड़ को संबोधित करते हुए एक उल्लेखनीय इमानदारी  के कमी दिखाई देती है , जबकि दूसरी तरफ , अखिलेश यादव विनम्र, मिलनसार , पार्टी के बड़े और पुराने लोगों को हाथ जोड़ कर नमस्ते करते हुए नज़र आते हैं  पार्टी कार्यक्रतायों को उनके नाम से   अदभुत प्रवाह से संबोधित करते रहे हैं. राहुल हमेशा यह जताते रहे की उत्तरप्रदेश उनके लिए महत्वपूर्ण है और उनके सोच में हैं और वे दलितों की बस्तियों और झोपड़ियों में रात बसेरा करते रहे वहीँ अखिलेश दूर से बने चबूतरों से कभी नहीं बोले , सुरक्षा घेरे से कभी बंधे नहीं रहे और तेज़ चाल से नीचे उतर कर दर्शकों की भीड़ में जा घुसते रहे .

राहुल का प्रचार अभियान इतने सावधानीपूर्वक  बुना और रचा गया था की वे  अभियान की  सहजता और आकर्षण खो चुके थे . इस अभियान कार्यकर्म में कोई मुख्य उद्देश्य नहीं था जो प्रचार के अंतिम पल तक टिका रहता . विभिन्न और कई बार  विरोधाभाषी  विचार , भटके हुए आवेगों से  चुनाव अभियान प्रभावित हुआ . कई बार ऐसा लगने लगा था किसी भी तरह के मज़बूत आधार के अनुपस्थित होने की वज़ह से फोटो या टीवी कैमरों में आने के लिए कुछ हरकतों पर निर्भरता होने लगी है .

राहुल की आत्म धारणा थी की वे एक  सच्चे , जमीन से जुड़े राजनैतिक नेता है , जो कठिन विषयों पर भी बातें करते हैं , जमीनी समस्याओं को जान लेते हैं , सही समय पर कार्यवाई भी करते हैं . हवाई बातें और ऊँची आसमानी सपने दिखने वाले टेलीविजन कैमरों और पत्रकारों ने उन्हें हिंदी भाषी राज्य का महानायक बनाना शुरू कर दी . इन्ही भीड़ को राहुल  के दृष्टिभार्म ने  अपना वोटर मान लिया .

यह अब लगने लगा था की कांग्रेस का मुख्य चुनाव प्रचारक  और पार्टी का चेहरा एक हवा के बुलबुला सा हो रहा हैं , वास्तविकता के कठोर हवायों से काफी अलग और दूर........उन्हें तो यह भी नहीं पता चला  की , उनका प्रभाव  असल में  किसी भी छेत्र में चाहे  निजी या सार्वज़निक , व्यक्तिगत या राजनैतिक ,....  मार्मिकता और करुणा की वज़ह से उपज रहा है ; जो  उनके और उनके परिवार को हर चीज़ में सहायता करता रहा है .
एक बेटी अपने मां के गालों  की चुटकी ले रही है , मेंडक के ऊपर बहिन का मजाक हो रहा है  शायद यह अहसास जताते हुए की उनके भाई एक खूबसूरत  राजकुमार हैं , एक पूरा  परिवार जो  चुनाव अभियान के  पिकनिक भ्रमण बच्चों सहित निकला है , बच्चो की मासूम तस्वीरें दिखाई जा रही हैं , और साले साहेब के इंटरवीयू  लिए जा रहे हैं , .......जो नहीं जानना चाहते उन्हें उनसे भी  ज्यादा जानकारी दी जा रही है ... यही राहुल के राजनीति अभियान के अलंकरण और आभूषण थे ....पता नहीं , जनता को किस राजनीती की संकेत दिए जा रहे थे और क्या बताना चाहते थे ???

अखिलेश ने समाजवादी पार्टी की सोच को नयी दिशा दी .  जातिगत विचारधारा को परिवर्तित करते हुए , मानव विकास के सभी पैमानों पर पिछड़े और  देश के सबसे अधिक जनसँख्या वाले राज्य के युवको की आकान्छायों और सपनो से आपने आप को और पार्टी को जोड़ा . अखिलेश ने  9000 KMs  कम से ज्यादा   यात्रायें की .उत्तरप्रदेश की तंग धूलभरी गललियों में साइकिल की से ..राज्य की 403 विधानसभा छेत्रों में 250 छेत्रों का  स्वंय  दौरा किया .....लोगों से अपने संपर्क बढाये......बड़े धैर्य से लाठीचार्ज को भी झेला .....चापलूसी और चिकनी चुपड़ी बातों को सरलता से लिया ...मंच पर  नीचे से फेंके जाने वाले गेंदे फूल की मालायों के लिए भी अपना सर उन्होंने झुकाया . अपने पार्टी कार्यकर्तायों के नाम से बुलाते रहे और उन्हें अपने   साथ दौरों पर बस में भी बैठाते रहे .उनके भाषण संक्षेप , रोचक और ओजस्वी रहे. उन्होंने मायावती की बुराईयों को भी , कहीं कहीं हास्य का सहारा लेते हुए जिक्र किया विगत 6 महोनों में 800 से ज्यादा रैल्लियाँ की. 

जहाँ राहुल गाँधी  one man show  थे..... कांग्रेस पार्टी की अन्दूरनी  संगठन व्यवस्था कमज़ोर थी और आपसी खींचातानी और आंतरिक विरोधों का सामना करना पड़ा हमेशा केंद्रीय और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के झुण्ड से घिरे रहे या उनके व्यूह में फंसे रहे..अखिलेश ने  राज्य की मिटटी में चल कर लोगों से अपना संबध बनाते रहे ...एक नए सोच और एक नयी दिशा की आशा की किरण लोगों में जगाते हुए ....



poonam shukla

Saturday, February 11, 2012


रैलियों और भाषणों में , जांत-पांत और धर्म के अलगाव पर खेली जाती घिनौनी राजनीती में,
चुनावी रणनीति और वादों के जाल में , मेरे विकास , शिक्षा और स्वास्थ्य की बातों को याद रखना !!!!

" वोट " का हथियार तुम्हारे हाथ है ...उनके बहते आँसुयों में न बहलो , मेरी आँखों में झांक कर देखो
शहीदों का क़र्ज़ है तुम पर , उनके और मेरे उस "भारत" के उन अधूरे सपनो को याद रखना !!!!!

poonam shukla

Railiyon aur bhashanon men , Jaant- Paant aur Dharm ke algaav par kheli jaati ghinauni Rajneeti men :
Chunavi rananeeti aur vadon ke jal men , mere vikas , shiksha aur swasthya kee baton ko yaad rakhana !!!!

" VOTE" ka hathiyaar tumahare pass hai ...unke bahate aasyuon men na bahalo , meri aankhon men jhaank kar dekho,
Shaheedon ka karz hai tum par , unke aur mere us Bharat ke un adhoore sapno ko yaad rakhana !!!!

‎"ए मेरे देश -- ए रहबरे- मुल्क


‎"ए मेरे देश -- ए रहबरे- मुल्क ,
मासूमियत सी इन मुस्कानों में , कल के सपने लिए इन आँखों में ,
एक बार झांक कर तो देखो ....जिसमें एक क्रांति की पुकार है....
सुप्त हुयी हमारी मानसिकता और ठन्डे हुए लहू को ललकार है.."
ए मेरे देश ,..

मुल्क के हर वाशिंदों में , हर दरजे में , हर आखों में निराशा देखा .
देश के सत्ताशिखर पर प्रजातंत्र के नाम पर ,हो रहा तमाशा देखा .
लुप्त होती नैतिकता , खत्म हुई मानवता ,बिकता इमानो-धर्म
हर किसी को धर्म और छेत्र के नाम पर ,हर एक के लहू का प्यासा देखा .

आज .....
मेरे देश के हर सवाल पर , यह रहबरे , मुल्क क्यों मौन सा है ?
अखबारों की काली सुर्ख़ियों में ;सहमा सिमटा यह देश कौन सा है ?

यह में क्या देखती हूँ .......
भयभीत चेहरों के बंद होठों की जुबान ,उजरीं हुई बस्तियां और जलते हुये मकान
खरोंचों से भरी देह लिए बहना की दास्तान ,क्या येही है ,मेरा वो प्यारा हिंदुस्तान .

केस की फाईलों से पटी अदालतें , न्याय क्यों इतना गूंगा बेहरा है ?
क्या मायने हैं आज़ादी के ,क्या गुलामी का जख्म इतना गहरा है ?
राजनीति की देहलीज़ पर दम तोड़ता प्रशासन ,
हर विकास , हर योजना , हर दफ्तर पर ,भ्रष्टाचार का पहरा है .

उन मासूम चेहरों को देखो जिन्होंने ने मौत को देखा है ,
जा कर पूछ रोती बहना से ,जिसने इंसानी वेश में हैवान देखा है .
क्या तेरी रगों में बहता नहीं , सुभाष , भगत, राणा और शिवाजी का खून ,
या फिर तुने कौन सा और कैसा हिंदुस्तान देखा है ?

नहीं देखी गज़नी और चंगेज़ की लूट ,तो अपने ही नेताओं द्वारा लूटता हिंदुस्तान देख
न सूनी नादिर के हमले , तो दंगों और आतंक से तड़पता हिंदुस्तान देख .
याद नहीं विभाजन की काली रातें , वोह गुलामी के काले दिन ,
तो गरीबी , भूखमरी और बेकारी से ; कराहता हिंदुस्तान देख .

यदि चाहिए वह देश ; तो हर कतरे मैं खून का उबाल चाहिए ,
गंगा कावेरी के मौजों से ; उछलता चीखता इन्कलाब चाहिए ,
हिमालय को पिघलाता , हिंद्सागर से उफानता
हर गली -कुचे मैं क्रांति का एलान चाहिए

आज़ादी मिली तो भी क्या , आज़ादी की जंग अभी भी जारी है
बाहरी ताकतों से कहीं ; ज्यादा अन्दूरनी खतरा भारी है
मंजिल अभी दूर है , रास्ता बहुत ही मुस्किल ,
उठ , अर्जुन ! उठा गांडीव ..देर न कर ..विश्राम की नहीं बारी है

बहुत हो गया ये तमाशा , अब मत फंसों
भ्रस्त और कुटील नेताओं के इन झूठे नारों में .
प्रगती के वादे थोथें हैं …...यह कुर्सियों की नौटंकी है ,
उठ ..आग लगा दो गन्दी राजनीती की इन दीवारों में

गीता के श्लोक तेरे गीत हों , कुरान तेरी जुबान हो ,
हर मुठ्ठियों में चेतना आये ,
उठे क्रांति हर बस्ती , हर गलियारों में .

"ए मेरे देश -- ए रहबरे- मुल्क ,
मासूमियत सी इन मुस्कानों में , कल के सपने लिए इन आँखों में ,
एक बार झांक कर तो देखो ....जिसमें एक क्रांति की पुकार है....
सुप्त हुयी हमारी मानसिकता और ठन्डे हुए लहू को ललकार है...."

Poonam Shukla

Let the Mashal of Kranti spreads

भ्रष्ट- तंत्र में हुई मैली सफ़ेद खादी है , पर तुम हरी खाकी वर्दियों का "गर्व" बनाये रखना !
अपराध और कुर्सियों के गठजोड़ में , निर्बलों - असहायों को ताक़त दिलाये रखना !
सत्ता के लालच में बिकते जमीरों के बाज़ार में , " संविधान" के मूल्यों को बचाए रखना !
मेहंदी लगे इन हाथों में , देश के लिए , मां दुर्गा और काली की ज्वाला को जलाये रखना !!

bhrast - Tantra men huyee maili safed khadi hai , par tum Hari Khaki vardiyon ka garv banaye rakhana !
apradh aur kursiyon ke gathjod men , nirbalon - asahayon ko taqat dilaye rakhana !
satta ke lalach men Bikate jameeron ke baazar me , sanvidhan ke mulyon ko bachaye rakhana !
mehandi lage in hathon me, Desh ke liye , maan Durga aur Kaali kee jwala ko jalaye rakhana !!

Poonam Shukla

Friday, February 3, 2012

केंद्रीय हिंदी निदेशालय , मानव संसाधन विकास मंत्रालय , भारत सरकार और हिंदी प्रचार प्रसार संस्थान जयपुर द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी :"हिंदी एवं हिंदीतर भाषी राज्यों में हिंदी की दशा एवम दिशा " : मेरी दी गयी प्रस्तुति और भाषण ( 20th Jan 2012)

गणमान्य गुरुजन एवं उपस्थित आदरणीय अतिथि गण

हिंदी भाषा के दशा और दिशा पर मैंने बहुत शोध और विचार किये I विगत 64 वर्षों में देश में किये जाने वाले हिंदी के विकास योजनायों और कार्यों की भी समीक्षा की I पर एक बात जो सत्य है वह यह की संविधान में 15 साल के बाद हिंदी को देश की भाषा बनाने की व्यवस्था के बाद भी हम उसे अधिकारिक तौर पर रास्ट्रभाषा का दर्ज़ा तक नहीं दे पायें हैं I हर देश की अपनी एक भाषा होती है जिसमें पूरा देश संवाद करता है। जिसके माध्यम से एक दूसरे को पहचानने व समझने की शक्ति मिलती है । जो देश की सही मायने में आत्मा होती है । परन्तु 64 वर्ष की स्वतंत्रता उपरान्त भी हमारे देश की सही मायने में कोई एक भाषा नहीं बन पाई है । जिसमें पूरा देश संवाद करता हो । आज भी वर्षों गुलामी का प्रतीक अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व ही सभी ओर हावी है । जबकि स्वाधीनता उपरान्त सर्वसम्मति से हिन्दी को भारतीय गणराज्य की राष्ट्रभाषा के रूप में संविधान के तहत मान्यता तो दे दी गई पर सही मायने में आज तक दोहरी मानसिकता के कारण इसका राष्ट्रीय स्वरूप उजागर नहीं हो पाया है।

एनकार्टा एन्साइक्लोपीडिया में भाषा के बोलने वालो की संख्या की अनुसार चीन के मैन्डरिन के 105 करोड़ के बाद. यदि हम विश्व के और देशों में जहाँ हिंदी भाषी बसे हैं को जोड़े तो हिंदी इस विश्व में करीब 100 करोड़ लोग बोलते है I पर यह कितनी बड़े शर्म की बात है की हिंदी विश्व में दूसरे स्थान पर होते हुए , आज भी संयुक्त रास्ट्र संघ की भाषा नहीं बन पायी है I

क्या हिंदी विकास में किये जाने वाले कार्य , योजनायें और कार्यक्रम किसी परिणाम को नहीं दिखा पा रहें हैं ? ऐसा क्यों है की हिंदी सिर्फ हिंदी दिवस पर सरकारी कार्यालयों में बोर्ड पर लिखा एक शब्द बन कर रह गयी है ? 

हिंदी देश में 51 % लोग जानते हैं I 2001 की जन गणना में 40 % लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताई है ; तो सवाल है की हिंदी फिर मात्र एक भाषा क्यों हैं ?

हिंदी के विकास , प्रचार और प्रसार के लिए काफी कार्य , योजनायें और कार्यकर्म कार्यान्वित किये गए हैं I आवश्यकता है इन योजनायों और कार्यों को बदलते सामाजिक परिवेश का रूप देना और आधुनिक संसधानो का प्रयोग करना. यह जरूरी है की इसे जनमानस में बताया जाए की हिंदी " छायावाद " का सिर्फ शोध करने या " सन्दर्भ सहित व्याखा कीजिये" वाली भाषा नहीं है बल्कि देश के प्रगति और समाज की उन्नति की भाषा है I

एक बार इमानदारी से सोचें , की वह क्या बात है जिसने अंग्रेजी भाषा को लोकप्रिय बनाया. गुलामी की मानसिकता को यदि दूर करें तो अंग्रेजी विकास और जीवनयापन की भाषा बन कर उभरती है. यही कारण की मध्यमवर्गीय परिवार भी बच्चे के शिक्षा के लिए इंग्लिश स्कूलों का चुनाव करता है और महँगी फीस देने के लिए भी तैयार होता है ; इसमें मैं कोई बुराई नहीं समजती I

मैं हिंदी भाषी छेत्र में पली-बड़ी पर बीस साल हिंदीतर छेत्रों में रही . जिसमे ७ साल मैंने तमिलनाडु और आँध्रप्रदेश में बिताये. हिंदी किसी सामाजिक वयवस्था का नहीं , बल्कि राजनैतिक संकीर्णता का शिकार है I

हमें यदि हिंदी का दशा में क्रन्तिकारी परिवर्तन करने हैं तो उसकी दिशा को राष्ट्रीय और व्यवसायीक विकास के ओर करना होगा. मैं हिंदी को राज्यों के आंकड़ों और किसी संख्या में उसकी दशा का आंकलन नहीं करना चाहूंगी ; क्योंकि मेरे विचार से उसका कोई अर्थ नहीं है. इन आंकड़ों पर हम हिंदी को नहीं तौल सकते . मेरे विचार से हमारे सोच में बदलाव की जरूरत है . वोह क्या बात है की १०० करोड़ हिन्दीभाषी होने और कई मुल्कों में बोले जाने के बाद भी हम अपने आप को कमज़ोर महसूस कर रहे हैं. इतना बड़ा हिदी बाज़ार कोई कैसे नज़रंदाज़ कर सकता है ? 

यदि आप ये सोचते है कि हिन्दी किसी को मान-सम्मान,पद और प्रतिष्ठा नहीं दिला सकती तो अपनी आँखे बंद कर एक बार सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का और एक बार स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का चेहरा अपनी बंद आँखों से देखिए और फिर सोचिये कि इन दोनों महान कलाकारों को पूरे विश्व में जो मान-सम्मान, यश और प्रतिष्ठा मिली है क्या वो हिन्दी के कारण नहीं मिली है ??? यदि अमिताभ हिन्दी फिल्मों में अभिनय नहीं करते तो क्या वे आज उस मुकाम पर पहुँच पाते जहां वो आज है? और यदि स्वर साम्राज्ञी लताजी हिन्दी में गीत न गाती तो क्या उनके स्वर सरहदों को पार कर करोडो लोगो तक पहुँच पाते ?? शायद नहीं .

पर सवाल ये भी कि एक हर व्यक्ति को तो ये सब नहीं मिल सकता जो लताजी को और अमितजी को हिन्दी से मिला किन्तु यकीन किजीये हिन्दी में अभी भी इतना सामर्थ्य है कि वो किसी के भी सपने साकार कर सकती है.आपको शायद ये जानकर हैरानी होगी कि आज के इस दौर में हिन्दी का ज्ञान भी आपके लिए कई संभावनाओं के नए द्वार खोल रहा है I

कितनी बड़ी ताकत है हिंदी की......जहाँ हमने हिंदी को व्यवसाय और अडवांस संस्कृति के नाम पर भुलाने की कोशिश की है , आज भी हिंदी अपने संगीत , गानों और साहित्य से आज भी प्रचलित है. इतनी बड़ी संख्या को आज के कारोबार में नाकारा नहीं जा सकता ...और यदि हम चाहें तो इस ताकत के बल पर हिंदी के विकास और प्रसार में अन्तराष्ट्रीय उद्योग जगत को शामिल कर सकते हैं. इसी संख्या के बल पर टेलिकॉम जगत , कंप्यूटर की दुनिया और विज्ञापन या मिडिया जगत हिंदी अपनानें में विवश है. यह एक अलग हास्यापद विषय है.. हिंदी के बल पर पुरस्कार पाने वाले पुरस्कार समारोह के वक़्त इंग्लिश में भाषण करते हैं I

हिंदी को आर्थिक प्रगति से जुड़ते ही , हिंदीतर और हिंदी समाज इसे अपनाने के लिए विवश हो जाएगा I

मुख्य रूप से घर की मजबूती भी माँ की सम्मान में भूमिका अदा करती है ? हिंदी की दशा के लिए हिंदी राज्यों का पिछड़ापन भी काफी ज्यादा जिम्मेदार है I हिंदी छेत्रों को कब तक बीमारू कहा जाता रहेगा ? जहाँ हिंदीतर राज्य साक्षरता में 75% से 90% से ज्यादा है वहीँ हिंदी बहुल राज्य सिर्फ 60% से 70% तक ही हैं और राष्ट्रीय औसत से कम हैं I हिंदी विकास के लिए बहुत जरूरी है हिंदी भाषी राज्यों का विकास I एक बात सोचने वाली है की क्या 100 करोड़ हिंदी ग्राहकों के लिए उद्योग जगत हिंदी कॉल सेण्टर नहीं खोलना चाहेगा ? यदि ऐसा होता है तो आप इंग्लिश स्पीकिंग कोचिंग के बोर्डों की जगह हिंदी सीखिए बोर्ड सडकों पर देखना शुरू करेंगे I पर यदि आप बिजली समस्या देखें तो जहाँ अहिन्दी राज्यों में उपलब्धता 70% से 90% से भे ज्यादा है , हिंदी राज्य मात्र 50% से 20% से भी नीचे हैं I जबकि जनसँख्या वृद्धि में हिन्दीभाषी राज्य हिंदीतर राज्यों से ज्यादा है. आप यह सोच रहे होंगे की राज्यों की विकास दर का भाषा की दशा से क्या लेना देना . पर यह समाया आ गया हैं की हम इस जान लें की हिंदी जनमघुट्टी की तरह नहीं पिलाई जा सकती और ना ही इस हम लाद सकते हैं I

हमें अंग्रेजी के समान्तर हिंदी भाषा का विकास करते हुए इसे उद्योग जगत की जरूरत बनानी होगी I कब तक हिंदी के लिए हम सरकरी फंड का मुंह जोहते रहेंगे . हमने हिंदी की ताक़त जान लेनी चाहिए. हिंदी किसी का मोहताज नहीं है और इसे बनाना भी नहीं है I क्या आप जानते हैं विश्व में सबसे ज्यादा बिकनेवाले शीर्ष 50 समाचारपत्रों में 4 समाचारपत्र हिंदी के हैं और भरते में शीर्ष 10 समाचारपत्रों में 3 हिन्दीभाषी समाचारपत्र हैं I

विश्व में कहीं भी हिन्दीभाषी लोग किसी भी परिवेश में हों और शायद हिंदी और संस्कृति से कोसों दूर हो , पर आज भी मेहंदी और संगीत में हिंदी संगीत ही बजता है और अन्ताक्षरी खेल में उनके होंठ हिंदी गाने ही गाते हैं I 

अन्तराष्ट्रीय उद्योग ने भी हिंदी की शक्ति को स्वीकार कर लिया है I गूगल , माईक्रोसोफ्ट , नोकिया , सैमसंग जैसे कंपनी हिंदी भाषा का उपयोग कर रही है I जहाँ 70% हिंदी जनता ग्रामीण इलाकों में रहती है वहां हिंदी का उपयोग इन कंपनियों के लिए विवशता है I हिंदी भाषी प्रदेशों के पिछड़ेपन की चाहे जितनी बात की जाएँ पर एक सत्य यह भी की देश का 32% मोबाइल उपभोक्ता यानि 20 करोड़ इन प्रदेशों में है I

यदि हर हिन्दी भाषी व्यक्ति हिन्दी के साथ किसी एक अन्य भारतीय भाषा को स्वीकार ले, उसे सीखने की कोशिश करे तो पूरे भारत के लोग दिल से हिन्दी को अपना लेंगे इसके लिए किसी बड़े आंदोलन की ज़रूरत नहीं होगी, पर ये पहल हिन्दी भाषी समाज को करनी होगी.1991 की जनगणना के अनुसार हिंदी भाषियों में दूसरी भाषा जानने वाले लोग सिर्फ 8 % और तीन भाषा मात्र 3% है जबकि अन्य भाष्यों में दूसरी भाषा और तीसरी भाषा की जानकारी रखने वालों का का अनुपात लगभग 10% से ज्यादा है I

1965 में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन से ही हिंदी को हिंदी बहुल छेत्रों की छेत्रीय भाषा का दर्ज़ा मिल गया है और हिंदीतर राज्यों में हिंदी अपन्नाने पर विरोध होने लगे I हिंदी का विरोध राष्ट्र भाषा का विरोध नहीं बल्कि उत्तरभारत के राज्यों का विरोध मन जाने लगा I देश में उभरती छेत्रीय राजनैतिक पार्टियों ने हिंदी विरोध को मानो उत्तरप्रदेश और बिहार का ही विरोध मन लिया है I जहाँ गुजरात उच्च न्यायालय ने इसे गुजरात के लिए विदेशी भाषा बताया है वहीँ देश के कई हिंदीतर राज्यों में हिंदी छेत्रीयता के नाम पर संकीर्ण और छेत्रीय राजनीती का शिकार होने लगी है I यदि हम कुछ पल , राजनीति को दरकिनार कर दें तो संन्स्कृति और सभ्यता की साथ अहिन्दीभाषी जन समाज हिंदी को अपनाते हैं और सीखते हैं I भारत सरकार और हिंदी निदेशालयों के आंकड़ों का अध्ययन करा रही थी तो यह जान कर ख़ुशी हुयी की हिंदीतर राज्यों में हिंदी सीखने वालों का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है I मैं स्वयं हिंदीतर राज्यों- दक्षिण राज्यों में रही हूँ और मैंने लोगों में हिंदी का सम्मान देखा है . कोशिश अब यह होनी चाहिए की हिंदी किसी संकीर्ण छेत्रीय राजनीति का शिकार न हो जाए I

बदलते सामाजिक परिवेश , उभरती छेत्रीय राजनैतिक ताकतें , जीवयापन के लिए लोगों का आवागमन और आधुनिक प्रसार और प्रचार की तकिनीकी को देखते हुए हिंदी के विकास के लिए नए सिरे से और नए तौर तरीकों से योजनायें बनाने की जरूरत है I शिष्यवृत्ति , अनुदानों और कानूनी प्रावधान भर पहना देने से अब हिंदी की दशा में सुधार नहीं होगा I

हिंदी की ताक़त को बढ़ते उपभोक्तावाद संस्कृति से जोड़ने की सख्त जरूरत है I व्यवसायीकरण के युग में हिंदी के उपयोग की महत्ता ही हिंदी की दशा निर्धारण करेगी और यही हिंदी के दशा में सुधार लाने की सटीक दवा साबित होगी I " इंग्लिश स्पीकिंग " बोर्डों की जगह " हिंदी सीखिए " जब दिखाई देने लगे , समझ लीजिये हिदी की शक्ति का सही उपयोग करने में हम सफल रहे हैं I 

जय हिंद

poonam shukla

Sunday, January 15, 2012

देश में ही नहीं विश्व भर में कुपोषण एक मानवीय शर्म है -
देश में ही नहीं विश्व भर में कुपोषण एक मानवीय शर्म है -
Its not only for India , its for world , malnutrition is humanitarian shame when we have more than 16000 cr $ only military expenditure per Year. 

विश्व का रक्षा बजट 16000 करोड़ $ हो गया है ( 2010) . विश्व के हर व्यक्ति पर $ 236 का रक्षा खर्च हो रहा है . यह GDP का 2.6% है. संयुक्त राष्ट्र संघ का बजट मात्र १इस रक्षा बजट का 1.6 % है. एक चौंका देने वाली बात पर एक कटु सत्य यह भी है की विश्व की आर्थिक निर्भरता और उद्योग - 4.4 % हिंसा और युद्ध पर आधरित हैं और फलफूल रहे हैं . शांति की नाम पर हो रहे पाखण्ड एक और सचः.. संयुक्त राष्ट्र संघ के शीर्ष 5 देश ही हथियार बाज़ार के मुख्या निर्माता और सप्लायर हैं. विश्व के विकासशील देश रोटी और बिजली की बुनियादी सुविधायों की बजाय हथियारों की अंधे होड़ में शामिल हैं . विगत 10 वर्षों में नुक्लीयर हथियारों पर 100000 करोड़ $ खर्च हुए हैं.

भारत का Rs 1,64,416 crore - विश्व में 10 स्थान और 1.83 % GDP रक्षा व्यय है तो पाकिस्तान का 2 .6% विश्व में 35 स्थान GDP सिर्फ सेना पर है .

भारत में हर रोज़ लगभग सवा आठ करोड़ लोग भूखे सोते हैं .लगभग 20 करोड़ लोग कुपोषण का शिकार हैं.

विश्व में 300करोड़ लोगों से भी अधिक केवल 2.5 $ पर्तिदिन पर जीवन निर्वाह करते हैं और गरीबी मापदंडो से नीचे हैं . ऊनिसेफ़ के अनुसार 22000 बच्चे प्रति दिन भूख और गरीबी से मरते हैं . विश्व के 260 करोड़ लोगों से भी ज्यादा लोग बुनियादी सुविधायों से वंचित हैं. विश्व के 160 करोड़ लोग आज भी अन्धकार में है बिना किसी बिजली के.

मैं पूछती हूँ विश्व के शासकों :

मेरे तन से वस्त्र खींच कर सेना तुम क्यूँ जुटा रहे हो .
मेरे मुंह का कौर छीन कर हथियार क्यूँ बना रहे हो
व्यापार के नाम पर अहिंसा की छाती पर छूरा भोंक
मानवता का ढोंग किये शांति शांति क्यूँ चिल्ला रहे हो

Friday, January 13, 2012



भ्रष्ट राजनीती के अंधियारे में ईमान और नैतिकता का प्रमाण मांगो !
आरक्षण का झुनझुना नहीं , शिक्षा और स्वालंबन की बुनियाद मांगो !
जात - धर्म पर सौदा कर रहे वे जिस मिट्टी की , अपराध की ताक़त पर ,
शहीदों के लहू से सिंची उस मिट्टी की , उनसे पूरी कीमत मांगो !


पूनम शुक्ल 


Bhrast rajneeti ke andhiyare men imaan aur naitikata ka praman maango !
aarakshan ka jhunjhuna nahin , shiksha aur swalamban ki buniyaad maango !
jaat - dharm par sauda kar rahe ve jis mitti ki , apradh ki taqat par ,

shaheedon ke lahu se sinchi us mitti ki , Unse poori Kimat maango !
                                                                   
                                                                   Poonam shukla

Wednesday, January 11, 2012

Special on Uttarpradesh Election : 

न जांत न पांत ...न ही मूर्तियों की सौगातें ....हर समाज हर तबके के विकास की हो बातें
भयमुक्त समाज ...अपराधमुक्त गलियां......हर एक को मिले रोजी रोटी का साधन


उत्तरप्रदेश में चुनावी रणनीति तैयार हो रही है. क्या होना चाहिए उत्तरप्रदेश की भाषा . अपराध और मूर्तियों से कहीं दूर , ‘हिन्दी हिंटरलैंड’ कहे जाने वाले इस राज्य में अब वक़्त है जनता को ही राजनैतिक भाषा बदलने की. कब तक जांत पांत पर जनता भेढ़ बकरी की तरह जेहाँ हांकी जाए चली जायेगी , मानी जाती रहेगी....पर सवाल है इस चुनावी नौटंकी में जनता को अब खुद अपना हक चीख कर माँगने की...चलिए यह सवाल पूछें आपने नेताओं से....जानिये कौन यह भाषा बोल रहा है....

इकोनॉमिक फ्रीडम ऑफ द स्टेट्स ऑफ इंडिया 2011 की रिपोर्ट के आधार पर आर्थिक नीतियों की दृष्टि से देश के 20 राज्यों में तमिलनाडु सबसे अधिक आर्थिक स्वतंत्रता वाला राज्य है. रिपोर्ट में गुजरात दूसरे स्थान पर और आंध्र प्रदेश तीसरे स्थान पर है, जबकि उत्तरप्रदेश को १४ वां बिहार को 20वां, उत्तराखंड को 19वां और असम को 18वां स्थान प्राप्त हुआ. 

जीडीपी में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 2000 के 9.7 प्रतिशत से घटकर 2010 में 8.1 प्रतिशत रह गई है।

मानव विकास सूचकांक के मामले में सबसे पिछड़ा राज्य बिहार (0.367) है। बिहार के तुरंत बाद असम (0.386), उत्तरप्रदेश (0.388) और मध्यप्रदेश (0.394) का नंबर है। 

भयमुक्त समाज ...अपराधमुक्त गलियां..... 
कानून व्यवस्था के मामले में भी हालात इतने अच्छे नहीं हैं. हिंसक अपराधिक वारदातों में 2007 में देश का 12.4 % ( 26693 आउट ऑफ़ , 2,15,693) उत्तरप्रदेश से था. मर्डर केस में देश का 15.5 % ( 5000 out of 32318 ) उत्तरप्रदेश की भागीधारी थी. अपहरण के मामले में देश का 16.5 % केसेस उत्तरप्रदेश के थे. जहाँ देश में 125 पुलिस जवान है हर लाख जनसँख्या पर वहीँ उत्तरप्रदेश मैं या औसत 80 है और बिहार में सिर्फ 60 . राज्य की कानून व्यवस्था ... ....विकास बढेगा जब लोग सुरक्षित होंगे

राज्य में युवाओं को रोजगार मिले.....हर एक को मिले रोजी रोटी का साधन

कब तक राज्य के लोग बाहरी राज्यों के शहरों में पलायन करते रहेंगे और हमेशा बाहरी होने का लेबल लगाये मार सहते रहेंगे...कृषि उत्पादनों को सही कीमत मिले....किसानो को उपज पर सही लाभ हो ... .विदेशों में बसे भूमिपुत्रों के लिए निवेश की विशेष सुविधा... उद्योगों के लिए विशेष सहूलियतें .

राज्य में भूमिपुत्रों के लिए रोजगार के अवसर .....उद्योगों का विकास. ..निवेश के लिए प्रोत्साहन 

न जांत न पांत ...न ही मूर्तियों की सौगातें ....हर समाज हर तबके के विकास की हो बातें

देश के अन्य राज्यों की तुलना मैं गरीबी का स्तर काफी ज्यादा है. 1973-1974 में 57.4% से घट कर 2004-2005 में 32.8 % हो तो गयी पर देश का औसत 54.9% से घट कर 27.5 % हो गया था. 2004-2005 के आंकड़ों के अनुसार उत्तरप्रदेश में 60 लाख लोग गरीबे रेखा से नीचे है जो देश का 1/5 भाग है.

साक्षरता मैं राज्य 56.3% है जबकी केरला 90.9% , गोवा 82.०% , हिमाचल प्रदेश 76.5 % और तमिलनाडु 73.5 % हैं. 35 राज्यों और केंद्र शाशित प्रदेशों में उत्तरप्रदेश का स्थान 31 है. शिक्षा मामले में 2004 के एक सर्वे के अनुसार अन्य राज्यों केरला ( 2.96 स्कूल / गाँव , 416 छात्र /गाँव) , आँध्रप्रदेश ( 1.98स्कूल/गाँव , 186छात्र /गाँव) के मुकाबले उत्तरप्रदेश में 0.97 स्कूल/गाँव और 314 छात्र/गाँव थे.

हर गाँव में शाला हो……हर बच्चे को शिक्षा मिले.....राज्य पढ़े और आगे बढे
हमारी भाषा ....राज्य के विकास की भाषा....हर समाज का विकास , सबका विकास

Poonam Shukla.