Sunday, November 27, 2011

ज्योतिष , कर्म और पुरुषार्थ


ज्योतिष , कर्म और पुरुषार्थ

धन वैभव प्राप्ति के लिए मनुष्य अत्यंत प्रयत्नशील रहता है. आप पत्रिकायों और  टीवी चैनलों को देख लें तो हजारों तरीकों से ज्योतिष और धर्म शास्त्र का सहारा लेकर कई तरह के विधि-विधान और अनुष्ठान बताएं जा रहे हैं . कई तरह के मंत्र - यन्त्र से वैभव और धन प्राप्ति के अचूक उपाय दिए जा रहे हैं. 

 हर विधि विधान और मंत्र-यन्त्र की अपना महत्व और  लाभ है . सही , उचित और शास्त्रोक्त रीतियों के अनुसार किये जाने वाले अनुष्ठानो का महत्व है और मनुष्य लाभान्वित भी होता है . हमारे प्राचीन शास्त्रों ने इसका विधिवत उल्लेख किया है. पर यह बात बहुत आवश्यक है की जिस तरह इसे आज समाज में प्रस्तुत  किया जा रहा है क्या वह उचित और सही है और क्या हम सर्व प्रकार से प्राचीन ज्ञान को समाज में प्रस्तुत कर रहे हैं. हमारी संस्कृति , सभ्यता और  सनातन धर्म कर्म प्रधान रहा है .  ज्योतिष और वेदों में उल्लेखित उपाय या  अनुष्ठान  कोई इन्स्टंट नूडल बनाने के नुस्खे नहीं थे. 

धन , वैभव और ऐश्वर्य प्राप्ति  की हर कोई साधना करना चाहता है.  दीपावली  के इस पवित्र पर्व पर आवश्यक है हम धर्म , ज्योतिष और प्राचीन ज्ञान के सहारे सही तरीके समझे , जाने और उपयोग में लाये ताकि जीवन को सफल बनाया जा सके .

!! कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती  . करमूले तु गोविन्द: प्रभाते करदर्शनम् !!  हमारे हाथों में ही मां लक्ष्मी , मां सरस्वती और भगवान गोविन्द का निवास है .


यथार्थ में ज्योतिष का मूल रूप कर्म विधान पर आधारित है. कर्म-पूर्व जन्म का,कर्म-वर्तमान जीवन का एवं इसके आधार पर विश्लेषण की प्रक्रिया.साथ ही देश,काल एवं पात्र का सिद्धांत भी लागु होता है.ज्योतिष विज्ञानं हमारे कर्मो का ढांचा बताता है . यह हमारे भूत वर्तमान और भविष्य में एक कड़ी बनता है. कर्म चार प्रकार के होते है:

१- संचित : संचित कर्म समस्त पूर्व जनम के कर्मो का संगृहीत रूप है
२- प्रारब्ध : प्रारब्ध कर्म , संचित कर्म का वह भाग होता है जिसका हम भोग वर्तमान जनम में करने वाले है . इसी को भाग्य भी कहते है.
३- क्रियमाण : क्रियमाण कर्म वह कर्म है जो हम वर्तमान में करते है . क्रियमाण कर्म इश्वर प्रदत्त वह संकल्प शक्ति है, जो हमारे कई पूर्व जन्म के कर्मो के दुष्प्रभावों को समाप्त करने में सहायता करती है. उ
४- आगम : आगम कर्म वह नए कर्म है जो की हम भविष्य में करने वाले हैं.

कर्म  करना एक तरह से मानव जीवन की विवशता ही है, क्यों कि किए गए कर्मों से ही प्रारब्ध का निर्माण होता है. भाग्य पूर्व के संचित कर्मों तथा वर्तमान जीवन के किए गए कर्मों के मिश्रण का ही रहस्यमयी अंश है. इसलिए अधिकतर लोग अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता के चरम को छूने के लिए निरन्तर संघर्षशील रहते हैं, लेकिन इनमें से बहुत कम ही अपने सपनों को हकीकत में बदल पाते हैं. ऎसी मान्यता है कि प्रकृ्ति केवल योग्य "प्रारब्ध" का ही स्वागत करती है. यहाँ योग्य शब्द विज्ञान के किसी भी तर्क तथा मानव बुद्धि की सीमा से बाहर है. "योग्यता" के बीज कर्मफल में ही छिपे रहते हैं और इन बीजों में लुप्त रहते हैं मानव के पूर्व जन्मों के वे श्राप अथवा वरदान, जिन्हे अपनी चेतना में समेटे आत्मा इस शरीर में जन्म लेती है.

गीता में लिखा है : 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।  मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।

कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो ।इसका तात्पर्य है की मन की आप कर्म करते वक़्त परिणामों की चिंता न करें पर आलस्यपन और  अकर्मण्यता के शिकार न हो 

तुलसी यह तनु खेत है, मन बच कर्म किसान |
पाप पुण्य द्दै बीज हैं, बबै सो लवै निदान ||

तुलसीदास मनुष्य शरीर की तुलना खेती की जमीन से करते हैं . बुध्धि , वचन और कर्म किसान की भूमिका है  जहां अच्छे और बुरे कर्मों का पाप और पुण्य की तरह बीज बोने पर उसी तरह से फसल की प्राप्ति होती है .

नए भविष्य निर्माण के लिए सबसे पहला कदम है अपनी कमियों को समझ कर उन्हें दूर करने का प्रयास करना. हम जो भी करें, उसके लिए हमें शांत, संयमित होना चाहिए. साथ ही अपने कर्मों का सजग रह कर विश्लेषण भी करना चाहिए. अगर हम कमियों को हमेशा सही ही साबित करेंगे तो हम कभी भी अपने जीवन में उन्नति नहीं कर पायेंगे और न ही भविष्य को संवार पायेंगे. हमारे पूर्व जन्म के बुरे कर्मों ने ही वर्तमान की विषम परिस्थितियों को पैदा किया होता है और हमारे अन्दर नकारात्मक कर्मों के लिए प्रवृत्ति भी पैदा की होती है. यदि हम उस प्रवृत्ति में बहते जायेंगे तो भविष्य और बिगड़ता ही जाएगा. अतः सबसे महत्त्वपूर्ण कदम है अपनी कमियों को समझना. 

न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया.
ब्रह्मात्मकबोधेन मोक्षः सिद्धयति नान्यथा..

ग़ीता का सिद्धान्त अति संक्षेपसे यह है कि मनुष्यको निष्काम भावसे स्वकर्ममें प्रवृत्त रहकर चित्तशुद्धि करनी चाहिये। चित्तशुद्धिका उपाय ही फलाकंक्षाको छोड़कर कर्म करना है। जबतक चित्तशुद्धि न होगी, जिज्ञासा उत्पन्न नहीं हो सकती, बिना जिज्ञासा के मोक्षकी इच्छा ही असम्भव है।

आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्र्चद्यौर्भूमिरापो हॄदयं यमश्र्च  
अहश्र्च रात्रिश्र्च उभे च संध्ये धर्माेऽपि जानाति नरस्य वॄत्तम् ! महाभारत !

सूर्य , चन्द्र , वायु , अग्नि , आकाश , पृथ्वी , जल , हृदय , यम , सूर्योदय और सूर्यास्त और धर्म हमेशा   हमारे कार्यों को देखते रहते है और उसके साक्ष्य है 

षड् दोषा: पुरूषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता 
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध: आलस्यं दीर्घसूत्रता ! पंचतंत्र !

जो विश्व में समृधि पाना चाहते है , उन्हें छः दोषों से दूर रहना चाहिए : लम्बी निद्रा या अज्ञान- हमारे इर्द गिर्द क्या हो रहा है इसकी जानकारी न होना  , तन्द्रा ,भय , क्रोध , आलस्य और कंजूसी  . 

ज्योतिष  समय का विज्ञानं है . तिथि , वार, नक्षत्र , योग और कर्म इन पांच चीजों का अध्ययन कर भविष्य में होने वाली घटनायों का आकलन किया जाता है . संभावनायों  और भविष्यवाणी के बजाय ज्योतिष शास्त्र का सही उपयोग  परामर्श , मानव जीवन को अनुशासित  और जिंदगी के हर पल का एक समुचित मार्गदर्शन के साधन के तौर पर समाज में प्रस्तुत करने की अंत्यत आवश्यकता है . केवल भविष्यवाणियों में सिमित न रह कर , ज्योतिष का आधार लेकर मनुष्य की जीवन की कई समस्यायों का हल निकाला जा सकता है. ज्योतिष भविष्य को बदलता नहीं बल्कि मनुष्य को सही और उचित सलाह देता है .  प्रथम तो हमें यह समझ लेना चाहिए की ज्योतिष है क्या ? ज्योतिष प्रकाश का नाम है | प्रकाश अँधेरे को दूर करता है अँधेरा लाता नहीं | ज्योतिष कर्म को निश्चित करता है कर्म से भटकाता नहीं | ज्योतिष व्यर्थ के प्रयासों से बचते हुए सफलता के लिए मदद करता है व्यर्थ के कार्य नहीं करवाता है | वस्तुतः ज्योतिष हमें हमारे अन्तर्निहित शक्ति का ज्ञान करवाते हुए सही दिशा प्रदान करता है | 


दीपावली का पर्व हमें वैभव और यश की कामना का संकेत देता है. हम अर्थ प्राप्ति की इच्छा रखते हुए उपासना करते हैं मां महालक्ष्मी की. इस अवसर पर विधि विधान से मां महालक्ष्मी की स्तुति करते हुए ध्यान रखिये की मां लक्ष्मी की उत्पति भी एक संघर्ष से हुयी थी. मां लक्ष्मी की प्राप्ति समुद्र मंथन से हुयी थी.  दीपवाली का उत्सव हम भगवान् श्री राम और  मां सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या आने की ख़ुशी में मनाते हैं . रामायण की कथा भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पुरुषार्थ का उल्लेख करती है.  आज  दीपवाली में धन  , वैभव और समृधि की कामना करते हुए मां महालक्ष्मी की  विधिवत पूजन कर  नित अच्छे और कल्याणकारी कर्म करने का संकल्प करें. सफलता आपके कदम चूमेंगी .

पूनम शुक्ला  
http://astropoonamshukla.blogspot.com/p/blog-page.html

Saturday, November 19, 2011

अन्तराष्ट्रीय जगत से ....विश्व स्तर पर समाचार...On Global as International News-" Vishva Vani " - Nov 2011 . A publication of "World Brahman Organization" - - USA and widely circulated all over world 

E-मेल पर प्राप्त सन्देश from Nepal :Congratulation Poonam Ji alot frrom Nepal brahmin Sabha.
नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ .

झरोखों से झांकती इन आशायों भरी आँखों को इंतज़ार है अपने पापा का ,
महंगाई की मार में गायब हो गए , उनके थैले में आज क्या छिपा होगा ?
इस झिर्री से घूरती , इन मासूम आँखों में , एक डर हमेशा छिपा रहता है ,
ब्रेअकिंग न्यूज़ की गिनती में , उनके घर का मालिक न गिना होगा ?

" तुम कल देश के भविष्य हो " का भाषण देने वालों इन आखों में झाँक कर देखे ,
वह सिर्फ इस बात की चिंता में है..आज की रात का भविष्य क्या होगा !!
सरकारी आंकड़ों में खोये यह बचपन किस मजहब या जाति का है
शिक्षा , स्वास्थ्य और पोषण के किन योजनायों में इनका नाम आया होगा ?

याद रहे इतिहास ने गवाही दी है
Ballot और Bullet ..दोनों भाषायों में इसने अपनी खामोश जुबाने बोली हैं,
जब जब इन मासूम सी आँखों को इन सवालों का जवाब नहीं आया होगा !!!


Nanha Munna Rahi hun desh ka sipahi hun....

Jhraokhon se jhankati in aashayon bhari aankhon ko intezaar hai apne papa ka ,
Mahangai kee maar men gayab ho gaye , unke thaile men aaj kya chhipa hoga ?
is Jhirri se ghoorati , in masoom aankhon men , ek dar hamesha chhipa rahata hai ,
Breaking news kee Ginati men , unke ghar ka malik na gina hoga ?

" Tum Kal desh ke bhavishya ho " ka Bhashan dene walon in aakhon men jhaank kar dekhe ,
wah sirf is baat kee chinta men hai .aaj kee Raat ka bhavishya kya hoga !!
Sarkari Aankadon men khoye yah bachpan Kis Majhab ya jati ka hai
shiksa , Swasthya aur Poshan के kin yojanayon में inka naam aaya hoga ?

yaad rahe itihas ने gawahi dee hai
Ballot aur Bullet ..dono bhashayon men isnae apnee khamosh jubane boli hai,
jab jab in masoom see aankhon ko in swalon ka jawab nahi aaya hoga !!!

Poonam Shukla

Sunday, October 23, 2011

21st October : Police Memorial Day of India : एक भूला खो गया दिन



21st October : Police Memorial Day of India : एक भूला खो गया दिन 

क्या आप जानते हैं की 21st October को "पोलिस शहीद दिवस " या " पुलिस स्मृति दिन " के लिए मनाया जाता है.

किसी अखबार ने या किसी टीवी चैनल ने इसकी कोई महत्वपूर्ण खबर न दी. ना ही मोमबत्ती मार्च करने वाले तथाकथित समाज के काफी की चुस्की में देश की हर समस्या पर चिंता बताने वाले बुद्धिजीवी वर्ग इस चर्चा की...और ना ही इन खाकी वर्दियों के सुरक्षा में रहने वाले नेता गणों ने संस्मरण किया या फिर ओप्चारिक्तायों के अलावा किया .

क्या आप जानते हैं की सितम्बर 2010 से इस वर्ष के 31 अगस्त तक देश में कुल 633 पुलिसकर्मी और अर्धसैनिक बलों के जवान शहीद हुए हैं , हम सबकी सुरक्षा के लिए लड़ते हुए . कैसे जान पाएंगे हम ....हमारक काम तो सड़कों पर किसी भी घटना पर पुलिस को कोसना और उनकी निंदा करना भर ही होता है. सरकार के पास तो हर समस्या चाहे वह नक्सल की हो या भट्टापौरसाल नॉएडा में किसानो के आन्दोलन का हो. ....खाकी ही नजर आती है...और अंत में यही राजनीती और समाज के चक्रव्यूह में शहीद भी होते हैं ...राजनैतिक दलों के पास विकास का मुद्दा सिर्फ नारों में वोटों के लिए रहा गया है . जांत पांत , धर्म और सामाजिक संबधों में दरार की राजनीती खेल कर सत्ता के गलियारों में पहुँचने वाले नेताओं , आपराधियों के सहारे वोट बटोर कर कुर्सी हथियाने वाले और आये दिन घोटालों की समाचारों में महंगाई से परेशान जनता ...क्या इन सबका हल सिर्फ कानून और खाकी है.

मुंबई के हुए आतंकवादी हमलों में शहीद हुए वर्दियों को तो हम कब का भुला बैठे हैं....क्या सोचा कभी की हम तो कुछ ही दिनों में पटरी पर आ गए पर उन मेहन्दी लगे हाथों का क्या ज्सिने चूड़ियाँ उतारी होगी...या फिर इन पथराई आँखों में एक मां का इंतज़ार.....क्या हम और हमारा समाज इतना स्वार्थी और बेशर्म हो गया है .क्या हम जानते है वर्षों से CRPF टुकड़ियाँ और पुलिस के जवान दंतेवाडा के बीहड़ जंगलों में बुनियादी नागरिक सुविधायों से दूर लगे हुए हैं और इस डर से की कब उनकी गाडी किस बारूदी सुरंग का शिकार हो जाए ? सरकार और नक्सल दोनों के बीच फंसे यह जवान बहनों की शादी , बुडी अम्मा की खांसी और अपने बड़ते बच्चों की मुस्कराहट के लिए तरसते हुए , अखबारों में नेताओं के भ्रष्ट काले कारनामें और बुद्धिजीवों की अनर्गल प्रलाप को भी जानते हुए इस लिए शहीद होने को तैयार हैं ताकि हम और आप काफी की चुस्कियां लेकर बहस कर सके.

सिर्फ FIR लिख देने से इसका हल नहीं निकलेगा .याद रहे पुलिस के जवान और अधिकारी भी इसी समाज से निकल कर आते हैं. प्रशासनिक अधिकारी भी इसी समाज में पैदा होते हैं. यही समाज भ्रस्त नेताओं और अपराधियों को जनम देता है. यही समाज पुलिश के मनोबल को गिराता है

एक नए दृष्टिकोण से बहस करें... क्या यह विडबना नहीं है इस विश्व के सबसे बड़े प्रजातान्त्रिक देश में निश्पच्छ चुनाव के लिए भी खाकी की ताक़त पर निर्भरता है..

सड़कों पर पत्थर बरसाते लोगों के बीच बुनियादी सुविधायों से वंचित 18 घंटो से ज्यादा कर्त्तव्य निभाती खाकी वर्दी के वेतन से बेखबर , कड़ाके की सर्दी हो या तीखी धुप या फिर तेज बारिश , मात्र ५०रुपये लेने वाले सिपाही पर देश के भ्रष्ट होने की चिंता और अपनी जरा सी गलती कर उसके टोकने पर फ़ोन घुमाने वाले हम लो...राजनीती की दहलीज़ पर कब तक दम तोड़ता रहेगा जवान ...शसस्त्र जवान ही क्यों मारे जातें हैं..... एक मॉडल की आत्महत्या और प्रेम की कहानी पाती है कई दिनों की सिलसिलेवार न्यूज़ कवरेज ...किसी विवादस्पद घटना पर इंडिया गेट पर मोमबत्ती जला कर मीडिया के सामने कुछ मिनटों का मार्च.....क्या इन जवानों के लिए कोई नहीं है ? क्या आप जानते हैं की 305 आत्महत्या 2004 से 2007 तक अर्धसैनिक बालों के जवानों ने की . Bureau of Police Research & Development Ministry of Home Affairs के अनुस्सर एक Survey में 77 % BSF जवानों ने ४ घंटे से कम नींद और आराम मिलने की बात की.

कम से कम आज के दिन पुलिस शहीद दिवस के अवसर पर इनके अच्छे कार्यों को याद करें....

क्या हम आते जाते कम से कम सडकों जाते अपनी एक कर के शीशे नीचे कर तीखी धुप में खड़े पुलिस वाले को एक मुस्कराहट दे सकें.....नेताओं से कुछ भी उम्मीद करना बेकार है..पर हम और आप तो यही कर सकते है......

"21 अक्टूबर 1959 को सीआरपीएफ के डिप्टी करमसिंह के नेतृत्व में 20 जवानों की गश्ती टोली लद्दाख में मुस्तैद थी। तभी चीनी सेना ने घात लगा कर हमला कर दिया। हमले में 10 जवान वीरगति को प्राप्त हुए। शेष को बंदी बना लिया गया। पुलिस जवानों के बलिदान की स्मृति में प्रतिवर्ष 21 अक्टूबर को देशभर में पुलिस शहीद दिवस का आयोजन किया जाता है। "

Thursday, July 7, 2011

देश के हर सवाल का जवाब खाकी नहीं है


देश के हर सवाल का जवाब खाकी नहीं है 

आज समाचारों में , टीवी न्यूज़ चैनलों में बढ़ते अपराध पर प्रोग्राम्स की संख्या भी बड़ती जा रही है . बहुत सालों बिकने वाली मनोहर कहानियां और सत्यकथा जिसे लोग शरमाते हुए बुक स्टाल  से खरीदते थे अब हमारें घर में बिना किसी संकोच के प्रसारित हो रहें हैं. बढ़ते अपराधों के राजनीती के बीच मैं यह सोचती रही की क्या हर इन सवालों का जवाब कानून है...और इसे नियंत्रण रखने की जिम्मेदारी सिर्फ  खाकी पर है.


1953 से 2009 के आंकड़ों का अध्ययन करने पर विगत 56  सालों में भारतीय समाज में अपराधों को लेकर इतनी बढ़ोत्तरी हुई है की जो हमारे गिरते सामाजिक मूल्यों का सबूत देते हैं और संस्कारित समाज की दुहाई को बेकार साबित  करते हैं

 विगत 56 सालों में अपराधों में 252% की बढ़ोत्तरी हुई है.  अपहरण के मामलों में 543% की बढोत्तरी हुई और  दंगों में 206 % की वृद्धि हुई .

 सबसे  दुःख की बात है भारत जैसे संस्कारित कहे जाने वाले समाज में बलात्कार के केसों में 760 % की बढ़ात्तरी हुई है. यह सिर्फ उन केसों के आंकड़े है जो दर्ज हुए हैं. 

2009  के एक आंकड़े के अनुसार महिलयों के प्रति अपराध  203804 केसेस हुए हैं जिसका सिर्फ  conviction rate  27.8% रहा है..

कुछ दिनों से उत्तरप्रदेश और दिल्ली में बलात्कार और महिलायों पर हो रहे संगीन  अपराधों को लेकर बहस छिड़ी हुई है और आये दिन इस तरह की वारदातें आ रही है....क्या है इसका हल ? गंगा यमुना की पवित्र भूमि पर इस तरह के अपराधों में हो रही बढ़त का जिम्मेदार कौन है ? येहाँ मैं पुलिसिया भूमिके पर बहस की बजाय एक अलग दृष्टिकोण पर बहस करना चाहूंगी...

2009 के आंकड़ों के अनुसार  21493 बलात्कार के केसों में 27.1  % नाबालिग केस थे.  क्या आप जानते हैं की 94 % केसों में अपराधी लड़की से परिचित लोग ही थे . 35 % पडोसी , 1.6 % नजदीकी संबधी  और 7.3  % केस दूर के संबधी थे.

अब नज़र डालते हैं पुलिस पर . 2010  में 371 पुलिस जवान शहीद हुए . 2006  से हर साल 350 से 400  पुलिस जवान हर साल कर्त्तव्य की बलिवेदी पर शहीद हो रहे हैं . 2009  कमें 954 पुलिस जवान मारे गए जिसमे 234  जवान नक्षलवाद/आतंकवाद के शिकार हुए ,  9 दंगों में और 60 अपराधियों का मुकाबला करते हुए बाकि 625 दुर्गतानयों के शिकार हुए. इसी साल 4020  जवान घायल  हुए जिसमे  1783 जवान दंगों  को सम्भालते वक़्त घायल हो गए और 968  जवान अपराधियों से लड़ते हुए अस्पताल पहुँच गए. 


जिस देश में सामाजिक रूप से अभी भी भारी विषमतायें हैं. ४०% जनसंख्या  भी अनपढ़ हैं . 43 % बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.  42% आबादी गरीबी रेखा के नीचे है  सार्वजनिक वितरण प्रणाली आधी आबादी तक नहीं पहुँच पा रहे है. भ्रस्टाचार से त्रस्त होकर देश के युवक बेकारी और हताशा के शिकार हो रहे हैं. देश के विकास कार्यों और योजनायों का लाभ जनता तक पहुँच ही नहीं पा रहा है जो आक्रोश को पैदा कर रहा है. 

राजनैतिक दलों के पास विकास का मुद्दा सिर्फ नारों में वोटों के लिए रहा गया है . जांत पांत , धर्म और सामाजिक संबधों में दरार की राजनीती खेल कर सत्ता के गलियारों में पहुँचने वाले नेताओं , आपराधियों के सहारे वोट बटोर कर कुर्सी हथियाने वाले और आये दिन  घोटालों की समाचारों में महंगाई से परेशान जनता ...क्या इन सबका हल सिर्फ कानून और खाकी है.

अधिकाश  छेत्र आयेदिन माओवादियों के कब्जे में होता जा रहा है...शोषण के खिलाफ लोगों का झुकाव नक्षलवाद की तरफ बढ़ता जा रहा है...हताश और लाचार युवक  अपराधों के पार्टी आकर्षित होते जा रहे हैं .

टीवी सीरियल और सिनेमा में खुले आम परोसे जा रहे अश्लीलता का भोजन , किसी भी  बुक स्टाल में आसानी से मिलती देशी विदेशी अश्लीलता को बेचती किताबें ...हम किस समाज का निर्माण कर रहे हैं. ?

संयुक्त परिवारों से अलग होती जिंदगी...पश्चिम का अन्धानुकरण  करती आज की युवा पीढ़ी जिसे आजादी बहुत सस्ती मिल गए है ...किन संस्कारों की बात हम कर रहे हैं ? 
समाज के सामने भी एक बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि आखिर कहॉ कमी रह गयी है हमारी शिक्षा और संस्कारों में जो हम किसी भी अबला को निशाना बनाने के लिए तत्पर हो जाते हैं. क्यों नहीं हमारी आत्मा हमें दुष्कृत्य करने से रोकने में सक्षम हो पाती और क्यों हमारी नारियां हर स्थान पर अपने को असुरक्षित पाती हैं.सवाल है स्त्रियोचित मानसिकता में बदलाव और परावलंबी भावना से मुक्ति पाने का.

रही बात सरकारी नीतियों की तो ध्यान रहना चाहिए ऐसे मामलों पर कितना भी कठोर कानून बना लिया जाए लेकिन जब तक समाज की मूलभूत मानसिकता में बदलाव नहीं होता, बहुत व्यापक परिवर्तन की आस बेकार है. सब कुछ सरकार के भरोसे छोड़ने की बजाय स्वयं की जिम्मेदारी समझने की अधिक आवश्यकता है तभी हम स्त्रियों के सम्मान और अस्मिता की रक्षा लायक समर्थ समाज बनाने में कामयाब हो सकेंगे.

समाज भूमिका अदा करता है बजाय मूक दर्शक बन कर सिर्फ टीवी न्यूज़ देख संतोष कर पुलिश पर टीका टिपण्णी कर . उसे जवाब मांगना  है नेताओं से सामाजिक सुरक्षा पर ना की कानून की धाराएँ बना कर. 

याद रहे पुलिश के जवान और अधिकारी भी इसी समाज से निकल कर आते हैं. प्रशासनिक अधिकारी भी इसी समाज में पैदा होते हैं. यही समाज भ्रस्त नेताओं और अपराधियों को जनम देता है.  यही समाज महिलायों की सुरक्षा का जिम्मेदार भी है. 

हमें  उन संस्कारों को जन्मघुट्टी की तरह पिलाना है ...हमें आपने सांस्कृतिक मूल्यों का इंजेक्सन  देकर इस समाज के रक्त में फैलाना है...यही इसका इलाज  है. 

तो आइये ...देश के अपराधों , नक्सलवाद का हल खाकी की बजाय कहीं और खोजें ...शायद हम इसकी जड़ तक पहुँच  जाए. कई बार हमें इसका मूल कारण पता रहता है पर जबान पर लेने  से डरते है . 

महिलायों के प्रति बढ़ते अपराध पर राजनीती करने की बजाय  इसका हल समाज के भीतर  खोंजे .....

सिर्फ  FIR लिख देने से इसका हल नहीं निकलेगा 

एक नए दृष्टिकोण से बहस करें...

क्या यह विडबना नहीं है इस  विश्व के सबसे बड़े प्रजातान्त्रिक देश में  निश्पच्छ चुनाव के लिए भी खाकी की ताक़त पर निर्भरता है....

poonam shukla

Sunday, May 29, 2011

वह रास्ता मेरे गाँव को जाता है


वह रास्ता मेरे गाँव को जाता है

बिखरे खेतों मैं पीली सरोसों और गन्नों की हरियाली 
बैलों की घंटियों में गूंजती सुबह शाम की लाली
पायल झंखाती गोरियां और अमराई में बूढों का जमघट
बच्चों के पीछे भागती अम्मा -चाचियों की प्यार भरी गाली 

रास्ते पर छपता हर चिह्न किसी के "आने" का संकेत दे जाता है
वह रास्ता मेरे गाँव को जाता है. वह रास्ता मेरे गाँव को जाता है

पर अब बिखरे खेतों में मेड़ें हैं , न वोह मिटटी की सोंधी गंध है 
सूनी अमराई , खामोश हवाएं , घरों में न अब बच्चों की हुर्दंग है 
न गोबरों की उपरी लगाती अम्मा है न रामायण बांचते चाचा ,
रिश्तों के चादर में अब जैसे हर किसी में आपस में कोई जंग है .

रास्ते पर हर पदचिह्न किसी के " जाने " का संकेत दे जाता है 
वह रास्ता मेरे गाँव को जाता है. वह रास्ता मेरे गाँव को जाता है

कोने में बेसुरे रेडियो के बीच गुमटी में चाय पीता मैं रास्ते को देखता गया 
धुल से भरे जीपों में किसी तरह लदे ठुंसे थके चेहरों को नापता गया 
कोई बता रहा था मुझे , एक दिन एहां कुछ हादसा हो गया था
हर ओर शोर मचा था ,शहर आ गया शहर आ गया शहर आ गया

यह रास्ता तब से पड़ा वहीँ , लूटा हुआ सा उदास आंसूं बहाता है
वह रास्ता मेरे गाँव को जाता है. वह रास्ता मेरे गाँव को जाता है

Saturday, April 30, 2011

यह विश्वास क्रांति माँगते हैं..

हमारी उम्मीदें हैं आसमान की ओर 

जैसे किसान को होती है घुमड़ते बादलों से



भक्तों की आस्था है नभमंडल के देवताओं से ,

हर वक़्त इसी तरह स्वाति बूंदों की टकटकी लगाये

चातक जैसी जनता की श्रधा है.....


इस दलदल की राजनीती में कोई तो
 बेदाग होगा,

जमीन की लूटमार में कोई तो नेता 
"जमीनी" होगा

पर बढ़ते गए इन सपनों के दायरे...

कौन कहे यह सपने क़ुरबानी माँगते हैं .

निष्क्रियता की चादर ओढ़े देश में ,

यह विश्वास क्रांति माँगते हैं..

इस मिट्टी की कीमत बनाये रखना .

भ्रष्ट राजनीती के अंधियारों में तुम ईमान की  मशाल जलाये रखना 
जिसके लिए कुर्बानियां दी है लोगों ने ;उस देश का हाल बचाए रखना ,

बेच रहें हैं तिरंगे की अस्मत ,  चंद लोग जिन कुर्सियों की ताक़त पर , 
तुम कल के सूरज बनकर  ; उन कुर्सियों पर  अपना हक जताए रखना 

घुटने टेक रही  जनता आज देश के हालात पर , हर ओर से उम्मीदें  हारकर 
उनका सहारा बनकर तुम ,  उनके आशायों  की  रोशनी  जगाये रखना .

इस देश की पावन मिट्टी शहीदों के लहू से सींची  गयी है ,
इस कुर्सियों के हर लालच से बचकर ;इस मिट्टी की कीमत बनाये रखना .

Saturday, April 9, 2011

Dedicated to Fight for Corruption Movement :


Dedicated to Fight for Corruption Movement :


पर याद रखना की इसी कमजोर भूख ने  सडकों पर आकर सरकारें हिलाई है ....
पेट के गहन  अँधेरे में शांत भूख की आवाजों ने इतिहास के पन्ने बदले हैं .  
हमारे निवाले छीन छीन कर बनते आपके महलों पर नजर नहीं डाली हमने                    
 पर याद रखिये ,पानी पी कर ठंडी होती  भूखों से कई देशों के आसमान जले हैं
    
         


  





Aaj ke  Yuvaon ko samarpit


 नहीं देखी गज़नी और चंगेज़ की लूट ,
तो अपने ही नेताओं द्वारा लूटता हिंदुस्तान देख .
न सूनी नादिर के हमले , तो दंगों और आतंक से तड़पता हिंदुस्तान देख .
याद नहीं विभाजन की काली रातें , वोह गुलामी के काले दिन ,
तो गरीबी , भूखमरी और बेकारी से कराहता हिंदुस्तान देख .


यदि चाहिए वह देश तो हर कतरे मैं खून का उबाल चाहिए ,
गंगा कावेरी के मौजों से उछलता चीखता इन्कलाब चाहिए ,
 हिमालय को पिघलाता , हिंद्सागर से उफानता
 हर गली -कुचे मैं क्रांति का एलान चाहिए


आज़ादी मिली तो भी क्या , आज़ादी की जंग अभी भी जारी है
बाहरी ताकतों से कहीं ज्यादा अन्दूरनी खतरा भारी है
मंजिल अभी दूर है , रास्ता बहुत ही मुस्किल ,
उठ , अर्जुन ! उठा गांडीव ..देर न कर ..
विश्राम की नहीं बारी है


बहुत हो गया ये तमाशा , अब मत फंसों
भ्रस्त और कुटील नेताओं के इन झूठे नारों में .
 प्रगती के वादे थोथें हैं …
 यह कुर्सियों की नौटंकी है ,
 उठ ..आग लगा दो गन्दी राजनीती की इन दीवारों में


गीता के श्लोक तेरे गीत हों , कुरान तेरी जुबान हो ,
 हर मुठ्ठियों में चेतना आये ,
 उठे क्रांति हर बस्ती , हर गलियारों में .
अख़बारों में सहमा सिमटा , आम इंसान की ,बंद होठों  की  जुबान
सत्ता के लुटेरो  के बीच  , इंसानियत  क्यों इतनी शर्मसार हो जाती है  !
 नील , टिगरिस  और यूफेरतेस  नदियाँ  क्यों  उफन जाती है ,
,जनता की भूख ही ही क्रांति है और यही इतिहास बनाती है !

 हर गलियों हर बस्तियों से चीखता चिल्लाता इंक़लाब चाहिए

किसी  सूने आँचल से और कोई ,सूनी  मांग  चिल्ला कर सवाल पूछती है
किसी युवक का  भूखे पेट ; सडकों पर आकर यही प्रश्न  दोहराते है  ,
किसी वृद्ध की पथराई आँखों से ना जाने कितने प्रश्न उठते है ,
तब सत्ता के शिखर पर मदहोश हुए सर क्यों शर्म से झुख जातें   है .

गंगा , ब्रह्मपुत्र  और कावेरी की मौजों से उबलता  वही उफान चाहिए
हर गलियों हर बस्तियों से चीखता चिल्लाता इंक़लाब चाहिए .
बडती महंगाई , बडती बेकारी , लूट खसोट का खुला बाज़ार
सरे आम मुल्क को आज  सडकों पर इन सबका जवाब चाहिए !!

Poonam Shukla
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