Saturday, February 11, 2012


रैलियों और भाषणों में , जांत-पांत और धर्म के अलगाव पर खेली जाती घिनौनी राजनीती में,
चुनावी रणनीति और वादों के जाल में , मेरे विकास , शिक्षा और स्वास्थ्य की बातों को याद रखना !!!!

" वोट " का हथियार तुम्हारे हाथ है ...उनके बहते आँसुयों में न बहलो , मेरी आँखों में झांक कर देखो
शहीदों का क़र्ज़ है तुम पर , उनके और मेरे उस "भारत" के उन अधूरे सपनो को याद रखना !!!!!

poonam shukla

Railiyon aur bhashanon men , Jaant- Paant aur Dharm ke algaav par kheli jaati ghinauni Rajneeti men :
Chunavi rananeeti aur vadon ke jal men , mere vikas , shiksha aur swasthya kee baton ko yaad rakhana !!!!

" VOTE" ka hathiyaar tumahare pass hai ...unke bahate aasyuon men na bahalo , meri aankhon men jhaank kar dekho,
Shaheedon ka karz hai tum par , unke aur mere us Bharat ke un adhoore sapno ko yaad rakhana !!!!

‎"ए मेरे देश -- ए रहबरे- मुल्क


‎"ए मेरे देश -- ए रहबरे- मुल्क ,
मासूमियत सी इन मुस्कानों में , कल के सपने लिए इन आँखों में ,
एक बार झांक कर तो देखो ....जिसमें एक क्रांति की पुकार है....
सुप्त हुयी हमारी मानसिकता और ठन्डे हुए लहू को ललकार है.."
ए मेरे देश ,..

मुल्क के हर वाशिंदों में , हर दरजे में , हर आखों में निराशा देखा .
देश के सत्ताशिखर पर प्रजातंत्र के नाम पर ,हो रहा तमाशा देखा .
लुप्त होती नैतिकता , खत्म हुई मानवता ,बिकता इमानो-धर्म
हर किसी को धर्म और छेत्र के नाम पर ,हर एक के लहू का प्यासा देखा .

आज .....
मेरे देश के हर सवाल पर , यह रहबरे , मुल्क क्यों मौन सा है ?
अखबारों की काली सुर्ख़ियों में ;सहमा सिमटा यह देश कौन सा है ?

यह में क्या देखती हूँ .......
भयभीत चेहरों के बंद होठों की जुबान ,उजरीं हुई बस्तियां और जलते हुये मकान
खरोंचों से भरी देह लिए बहना की दास्तान ,क्या येही है ,मेरा वो प्यारा हिंदुस्तान .

केस की फाईलों से पटी अदालतें , न्याय क्यों इतना गूंगा बेहरा है ?
क्या मायने हैं आज़ादी के ,क्या गुलामी का जख्म इतना गहरा है ?
राजनीति की देहलीज़ पर दम तोड़ता प्रशासन ,
हर विकास , हर योजना , हर दफ्तर पर ,भ्रष्टाचार का पहरा है .

उन मासूम चेहरों को देखो जिन्होंने ने मौत को देखा है ,
जा कर पूछ रोती बहना से ,जिसने इंसानी वेश में हैवान देखा है .
क्या तेरी रगों में बहता नहीं , सुभाष , भगत, राणा और शिवाजी का खून ,
या फिर तुने कौन सा और कैसा हिंदुस्तान देखा है ?

नहीं देखी गज़नी और चंगेज़ की लूट ,तो अपने ही नेताओं द्वारा लूटता हिंदुस्तान देख
न सूनी नादिर के हमले , तो दंगों और आतंक से तड़पता हिंदुस्तान देख .
याद नहीं विभाजन की काली रातें , वोह गुलामी के काले दिन ,
तो गरीबी , भूखमरी और बेकारी से ; कराहता हिंदुस्तान देख .

यदि चाहिए वह देश ; तो हर कतरे मैं खून का उबाल चाहिए ,
गंगा कावेरी के मौजों से ; उछलता चीखता इन्कलाब चाहिए ,
हिमालय को पिघलाता , हिंद्सागर से उफानता
हर गली -कुचे मैं क्रांति का एलान चाहिए

आज़ादी मिली तो भी क्या , आज़ादी की जंग अभी भी जारी है
बाहरी ताकतों से कहीं ; ज्यादा अन्दूरनी खतरा भारी है
मंजिल अभी दूर है , रास्ता बहुत ही मुस्किल ,
उठ , अर्जुन ! उठा गांडीव ..देर न कर ..विश्राम की नहीं बारी है

बहुत हो गया ये तमाशा , अब मत फंसों
भ्रस्त और कुटील नेताओं के इन झूठे नारों में .
प्रगती के वादे थोथें हैं …...यह कुर्सियों की नौटंकी है ,
उठ ..आग लगा दो गन्दी राजनीती की इन दीवारों में

गीता के श्लोक तेरे गीत हों , कुरान तेरी जुबान हो ,
हर मुठ्ठियों में चेतना आये ,
उठे क्रांति हर बस्ती , हर गलियारों में .

"ए मेरे देश -- ए रहबरे- मुल्क ,
मासूमियत सी इन मुस्कानों में , कल के सपने लिए इन आँखों में ,
एक बार झांक कर तो देखो ....जिसमें एक क्रांति की पुकार है....
सुप्त हुयी हमारी मानसिकता और ठन्डे हुए लहू को ललकार है...."

Poonam Shukla

Let the Mashal of Kranti spreads

भ्रष्ट- तंत्र में हुई मैली सफ़ेद खादी है , पर तुम हरी खाकी वर्दियों का "गर्व" बनाये रखना !
अपराध और कुर्सियों के गठजोड़ में , निर्बलों - असहायों को ताक़त दिलाये रखना !
सत्ता के लालच में बिकते जमीरों के बाज़ार में , " संविधान" के मूल्यों को बचाए रखना !
मेहंदी लगे इन हाथों में , देश के लिए , मां दुर्गा और काली की ज्वाला को जलाये रखना !!

bhrast - Tantra men huyee maili safed khadi hai , par tum Hari Khaki vardiyon ka garv banaye rakhana !
apradh aur kursiyon ke gathjod men , nirbalon - asahayon ko taqat dilaye rakhana !
satta ke lalach men Bikate jameeron ke baazar me , sanvidhan ke mulyon ko bachaye rakhana !
mehandi lage in hathon me, Desh ke liye , maan Durga aur Kaali kee jwala ko jalaye rakhana !!

Poonam Shukla

Friday, February 3, 2012

केंद्रीय हिंदी निदेशालय , मानव संसाधन विकास मंत्रालय , भारत सरकार और हिंदी प्रचार प्रसार संस्थान जयपुर द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी :"हिंदी एवं हिंदीतर भाषी राज्यों में हिंदी की दशा एवम दिशा " : मेरी दी गयी प्रस्तुति और भाषण ( 20th Jan 2012)

गणमान्य गुरुजन एवं उपस्थित आदरणीय अतिथि गण

हिंदी भाषा के दशा और दिशा पर मैंने बहुत शोध और विचार किये I विगत 64 वर्षों में देश में किये जाने वाले हिंदी के विकास योजनायों और कार्यों की भी समीक्षा की I पर एक बात जो सत्य है वह यह की संविधान में 15 साल के बाद हिंदी को देश की भाषा बनाने की व्यवस्था के बाद भी हम उसे अधिकारिक तौर पर रास्ट्रभाषा का दर्ज़ा तक नहीं दे पायें हैं I हर देश की अपनी एक भाषा होती है जिसमें पूरा देश संवाद करता है। जिसके माध्यम से एक दूसरे को पहचानने व समझने की शक्ति मिलती है । जो देश की सही मायने में आत्मा होती है । परन्तु 64 वर्ष की स्वतंत्रता उपरान्त भी हमारे देश की सही मायने में कोई एक भाषा नहीं बन पाई है । जिसमें पूरा देश संवाद करता हो । आज भी वर्षों गुलामी का प्रतीक अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व ही सभी ओर हावी है । जबकि स्वाधीनता उपरान्त सर्वसम्मति से हिन्दी को भारतीय गणराज्य की राष्ट्रभाषा के रूप में संविधान के तहत मान्यता तो दे दी गई पर सही मायने में आज तक दोहरी मानसिकता के कारण इसका राष्ट्रीय स्वरूप उजागर नहीं हो पाया है।

एनकार्टा एन्साइक्लोपीडिया में भाषा के बोलने वालो की संख्या की अनुसार चीन के मैन्डरिन के 105 करोड़ के बाद. यदि हम विश्व के और देशों में जहाँ हिंदी भाषी बसे हैं को जोड़े तो हिंदी इस विश्व में करीब 100 करोड़ लोग बोलते है I पर यह कितनी बड़े शर्म की बात है की हिंदी विश्व में दूसरे स्थान पर होते हुए , आज भी संयुक्त रास्ट्र संघ की भाषा नहीं बन पायी है I

क्या हिंदी विकास में किये जाने वाले कार्य , योजनायें और कार्यक्रम किसी परिणाम को नहीं दिखा पा रहें हैं ? ऐसा क्यों है की हिंदी सिर्फ हिंदी दिवस पर सरकारी कार्यालयों में बोर्ड पर लिखा एक शब्द बन कर रह गयी है ? 

हिंदी देश में 51 % लोग जानते हैं I 2001 की जन गणना में 40 % लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताई है ; तो सवाल है की हिंदी फिर मात्र एक भाषा क्यों हैं ?

हिंदी के विकास , प्रचार और प्रसार के लिए काफी कार्य , योजनायें और कार्यकर्म कार्यान्वित किये गए हैं I आवश्यकता है इन योजनायों और कार्यों को बदलते सामाजिक परिवेश का रूप देना और आधुनिक संसधानो का प्रयोग करना. यह जरूरी है की इसे जनमानस में बताया जाए की हिंदी " छायावाद " का सिर्फ शोध करने या " सन्दर्भ सहित व्याखा कीजिये" वाली भाषा नहीं है बल्कि देश के प्रगति और समाज की उन्नति की भाषा है I

एक बार इमानदारी से सोचें , की वह क्या बात है जिसने अंग्रेजी भाषा को लोकप्रिय बनाया. गुलामी की मानसिकता को यदि दूर करें तो अंग्रेजी विकास और जीवनयापन की भाषा बन कर उभरती है. यही कारण की मध्यमवर्गीय परिवार भी बच्चे के शिक्षा के लिए इंग्लिश स्कूलों का चुनाव करता है और महँगी फीस देने के लिए भी तैयार होता है ; इसमें मैं कोई बुराई नहीं समजती I

मैं हिंदी भाषी छेत्र में पली-बड़ी पर बीस साल हिंदीतर छेत्रों में रही . जिसमे ७ साल मैंने तमिलनाडु और आँध्रप्रदेश में बिताये. हिंदी किसी सामाजिक वयवस्था का नहीं , बल्कि राजनैतिक संकीर्णता का शिकार है I

हमें यदि हिंदी का दशा में क्रन्तिकारी परिवर्तन करने हैं तो उसकी दिशा को राष्ट्रीय और व्यवसायीक विकास के ओर करना होगा. मैं हिंदी को राज्यों के आंकड़ों और किसी संख्या में उसकी दशा का आंकलन नहीं करना चाहूंगी ; क्योंकि मेरे विचार से उसका कोई अर्थ नहीं है. इन आंकड़ों पर हम हिंदी को नहीं तौल सकते . मेरे विचार से हमारे सोच में बदलाव की जरूरत है . वोह क्या बात है की १०० करोड़ हिन्दीभाषी होने और कई मुल्कों में बोले जाने के बाद भी हम अपने आप को कमज़ोर महसूस कर रहे हैं. इतना बड़ा हिदी बाज़ार कोई कैसे नज़रंदाज़ कर सकता है ? 

यदि आप ये सोचते है कि हिन्दी किसी को मान-सम्मान,पद और प्रतिष्ठा नहीं दिला सकती तो अपनी आँखे बंद कर एक बार सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का और एक बार स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का चेहरा अपनी बंद आँखों से देखिए और फिर सोचिये कि इन दोनों महान कलाकारों को पूरे विश्व में जो मान-सम्मान, यश और प्रतिष्ठा मिली है क्या वो हिन्दी के कारण नहीं मिली है ??? यदि अमिताभ हिन्दी फिल्मों में अभिनय नहीं करते तो क्या वे आज उस मुकाम पर पहुँच पाते जहां वो आज है? और यदि स्वर साम्राज्ञी लताजी हिन्दी में गीत न गाती तो क्या उनके स्वर सरहदों को पार कर करोडो लोगो तक पहुँच पाते ?? शायद नहीं .

पर सवाल ये भी कि एक हर व्यक्ति को तो ये सब नहीं मिल सकता जो लताजी को और अमितजी को हिन्दी से मिला किन्तु यकीन किजीये हिन्दी में अभी भी इतना सामर्थ्य है कि वो किसी के भी सपने साकार कर सकती है.आपको शायद ये जानकर हैरानी होगी कि आज के इस दौर में हिन्दी का ज्ञान भी आपके लिए कई संभावनाओं के नए द्वार खोल रहा है I

कितनी बड़ी ताकत है हिंदी की......जहाँ हमने हिंदी को व्यवसाय और अडवांस संस्कृति के नाम पर भुलाने की कोशिश की है , आज भी हिंदी अपने संगीत , गानों और साहित्य से आज भी प्रचलित है. इतनी बड़ी संख्या को आज के कारोबार में नाकारा नहीं जा सकता ...और यदि हम चाहें तो इस ताकत के बल पर हिंदी के विकास और प्रसार में अन्तराष्ट्रीय उद्योग जगत को शामिल कर सकते हैं. इसी संख्या के बल पर टेलिकॉम जगत , कंप्यूटर की दुनिया और विज्ञापन या मिडिया जगत हिंदी अपनानें में विवश है. यह एक अलग हास्यापद विषय है.. हिंदी के बल पर पुरस्कार पाने वाले पुरस्कार समारोह के वक़्त इंग्लिश में भाषण करते हैं I

हिंदी को आर्थिक प्रगति से जुड़ते ही , हिंदीतर और हिंदी समाज इसे अपनाने के लिए विवश हो जाएगा I

मुख्य रूप से घर की मजबूती भी माँ की सम्मान में भूमिका अदा करती है ? हिंदी की दशा के लिए हिंदी राज्यों का पिछड़ापन भी काफी ज्यादा जिम्मेदार है I हिंदी छेत्रों को कब तक बीमारू कहा जाता रहेगा ? जहाँ हिंदीतर राज्य साक्षरता में 75% से 90% से ज्यादा है वहीँ हिंदी बहुल राज्य सिर्फ 60% से 70% तक ही हैं और राष्ट्रीय औसत से कम हैं I हिंदी विकास के लिए बहुत जरूरी है हिंदी भाषी राज्यों का विकास I एक बात सोचने वाली है की क्या 100 करोड़ हिंदी ग्राहकों के लिए उद्योग जगत हिंदी कॉल सेण्टर नहीं खोलना चाहेगा ? यदि ऐसा होता है तो आप इंग्लिश स्पीकिंग कोचिंग के बोर्डों की जगह हिंदी सीखिए बोर्ड सडकों पर देखना शुरू करेंगे I पर यदि आप बिजली समस्या देखें तो जहाँ अहिन्दी राज्यों में उपलब्धता 70% से 90% से भे ज्यादा है , हिंदी राज्य मात्र 50% से 20% से भी नीचे हैं I जबकि जनसँख्या वृद्धि में हिन्दीभाषी राज्य हिंदीतर राज्यों से ज्यादा है. आप यह सोच रहे होंगे की राज्यों की विकास दर का भाषा की दशा से क्या लेना देना . पर यह समाया आ गया हैं की हम इस जान लें की हिंदी जनमघुट्टी की तरह नहीं पिलाई जा सकती और ना ही इस हम लाद सकते हैं I

हमें अंग्रेजी के समान्तर हिंदी भाषा का विकास करते हुए इसे उद्योग जगत की जरूरत बनानी होगी I कब तक हिंदी के लिए हम सरकरी फंड का मुंह जोहते रहेंगे . हमने हिंदी की ताक़त जान लेनी चाहिए. हिंदी किसी का मोहताज नहीं है और इसे बनाना भी नहीं है I क्या आप जानते हैं विश्व में सबसे ज्यादा बिकनेवाले शीर्ष 50 समाचारपत्रों में 4 समाचारपत्र हिंदी के हैं और भरते में शीर्ष 10 समाचारपत्रों में 3 हिन्दीभाषी समाचारपत्र हैं I

विश्व में कहीं भी हिन्दीभाषी लोग किसी भी परिवेश में हों और शायद हिंदी और संस्कृति से कोसों दूर हो , पर आज भी मेहंदी और संगीत में हिंदी संगीत ही बजता है और अन्ताक्षरी खेल में उनके होंठ हिंदी गाने ही गाते हैं I 

अन्तराष्ट्रीय उद्योग ने भी हिंदी की शक्ति को स्वीकार कर लिया है I गूगल , माईक्रोसोफ्ट , नोकिया , सैमसंग जैसे कंपनी हिंदी भाषा का उपयोग कर रही है I जहाँ 70% हिंदी जनता ग्रामीण इलाकों में रहती है वहां हिंदी का उपयोग इन कंपनियों के लिए विवशता है I हिंदी भाषी प्रदेशों के पिछड़ेपन की चाहे जितनी बात की जाएँ पर एक सत्य यह भी की देश का 32% मोबाइल उपभोक्ता यानि 20 करोड़ इन प्रदेशों में है I

यदि हर हिन्दी भाषी व्यक्ति हिन्दी के साथ किसी एक अन्य भारतीय भाषा को स्वीकार ले, उसे सीखने की कोशिश करे तो पूरे भारत के लोग दिल से हिन्दी को अपना लेंगे इसके लिए किसी बड़े आंदोलन की ज़रूरत नहीं होगी, पर ये पहल हिन्दी भाषी समाज को करनी होगी.1991 की जनगणना के अनुसार हिंदी भाषियों में दूसरी भाषा जानने वाले लोग सिर्फ 8 % और तीन भाषा मात्र 3% है जबकि अन्य भाष्यों में दूसरी भाषा और तीसरी भाषा की जानकारी रखने वालों का का अनुपात लगभग 10% से ज्यादा है I

1965 में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन से ही हिंदी को हिंदी बहुल छेत्रों की छेत्रीय भाषा का दर्ज़ा मिल गया है और हिंदीतर राज्यों में हिंदी अपन्नाने पर विरोध होने लगे I हिंदी का विरोध राष्ट्र भाषा का विरोध नहीं बल्कि उत्तरभारत के राज्यों का विरोध मन जाने लगा I देश में उभरती छेत्रीय राजनैतिक पार्टियों ने हिंदी विरोध को मानो उत्तरप्रदेश और बिहार का ही विरोध मन लिया है I जहाँ गुजरात उच्च न्यायालय ने इसे गुजरात के लिए विदेशी भाषा बताया है वहीँ देश के कई हिंदीतर राज्यों में हिंदी छेत्रीयता के नाम पर संकीर्ण और छेत्रीय राजनीती का शिकार होने लगी है I यदि हम कुछ पल , राजनीति को दरकिनार कर दें तो संन्स्कृति और सभ्यता की साथ अहिन्दीभाषी जन समाज हिंदी को अपनाते हैं और सीखते हैं I भारत सरकार और हिंदी निदेशालयों के आंकड़ों का अध्ययन करा रही थी तो यह जान कर ख़ुशी हुयी की हिंदीतर राज्यों में हिंदी सीखने वालों का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है I मैं स्वयं हिंदीतर राज्यों- दक्षिण राज्यों में रही हूँ और मैंने लोगों में हिंदी का सम्मान देखा है . कोशिश अब यह होनी चाहिए की हिंदी किसी संकीर्ण छेत्रीय राजनीति का शिकार न हो जाए I

बदलते सामाजिक परिवेश , उभरती छेत्रीय राजनैतिक ताकतें , जीवयापन के लिए लोगों का आवागमन और आधुनिक प्रसार और प्रचार की तकिनीकी को देखते हुए हिंदी के विकास के लिए नए सिरे से और नए तौर तरीकों से योजनायें बनाने की जरूरत है I शिष्यवृत्ति , अनुदानों और कानूनी प्रावधान भर पहना देने से अब हिंदी की दशा में सुधार नहीं होगा I

हिंदी की ताक़त को बढ़ते उपभोक्तावाद संस्कृति से जोड़ने की सख्त जरूरत है I व्यवसायीकरण के युग में हिंदी के उपयोग की महत्ता ही हिंदी की दशा निर्धारण करेगी और यही हिंदी के दशा में सुधार लाने की सटीक दवा साबित होगी I " इंग्लिश स्पीकिंग " बोर्डों की जगह " हिंदी सीखिए " जब दिखाई देने लगे , समझ लीजिये हिदी की शक्ति का सही उपयोग करने में हम सफल रहे हैं I 

जय हिंद

poonam shukla

Sunday, January 15, 2012

देश में ही नहीं विश्व भर में कुपोषण एक मानवीय शर्म है -
देश में ही नहीं विश्व भर में कुपोषण एक मानवीय शर्म है -
Its not only for India , its for world , malnutrition is humanitarian shame when we have more than 16000 cr $ only military expenditure per Year. 

विश्व का रक्षा बजट 16000 करोड़ $ हो गया है ( 2010) . विश्व के हर व्यक्ति पर $ 236 का रक्षा खर्च हो रहा है . यह GDP का 2.6% है. संयुक्त राष्ट्र संघ का बजट मात्र १इस रक्षा बजट का 1.6 % है. एक चौंका देने वाली बात पर एक कटु सत्य यह भी है की विश्व की आर्थिक निर्भरता और उद्योग - 4.4 % हिंसा और युद्ध पर आधरित हैं और फलफूल रहे हैं . शांति की नाम पर हो रहे पाखण्ड एक और सचः.. संयुक्त राष्ट्र संघ के शीर्ष 5 देश ही हथियार बाज़ार के मुख्या निर्माता और सप्लायर हैं. विश्व के विकासशील देश रोटी और बिजली की बुनियादी सुविधायों की बजाय हथियारों की अंधे होड़ में शामिल हैं . विगत 10 वर्षों में नुक्लीयर हथियारों पर 100000 करोड़ $ खर्च हुए हैं.

भारत का Rs 1,64,416 crore - विश्व में 10 स्थान और 1.83 % GDP रक्षा व्यय है तो पाकिस्तान का 2 .6% विश्व में 35 स्थान GDP सिर्फ सेना पर है .

भारत में हर रोज़ लगभग सवा आठ करोड़ लोग भूखे सोते हैं .लगभग 20 करोड़ लोग कुपोषण का शिकार हैं.

विश्व में 300करोड़ लोगों से भी अधिक केवल 2.5 $ पर्तिदिन पर जीवन निर्वाह करते हैं और गरीबी मापदंडो से नीचे हैं . ऊनिसेफ़ के अनुसार 22000 बच्चे प्रति दिन भूख और गरीबी से मरते हैं . विश्व के 260 करोड़ लोगों से भी ज्यादा लोग बुनियादी सुविधायों से वंचित हैं. विश्व के 160 करोड़ लोग आज भी अन्धकार में है बिना किसी बिजली के.

मैं पूछती हूँ विश्व के शासकों :

मेरे तन से वस्त्र खींच कर सेना तुम क्यूँ जुटा रहे हो .
मेरे मुंह का कौर छीन कर हथियार क्यूँ बना रहे हो
व्यापार के नाम पर अहिंसा की छाती पर छूरा भोंक
मानवता का ढोंग किये शांति शांति क्यूँ चिल्ला रहे हो

Friday, January 13, 2012



भ्रष्ट राजनीती के अंधियारे में ईमान और नैतिकता का प्रमाण मांगो !
आरक्षण का झुनझुना नहीं , शिक्षा और स्वालंबन की बुनियाद मांगो !
जात - धर्म पर सौदा कर रहे वे जिस मिट्टी की , अपराध की ताक़त पर ,
शहीदों के लहू से सिंची उस मिट्टी की , उनसे पूरी कीमत मांगो !


पूनम शुक्ल 


Bhrast rajneeti ke andhiyare men imaan aur naitikata ka praman maango !
aarakshan ka jhunjhuna nahin , shiksha aur swalamban ki buniyaad maango !
jaat - dharm par sauda kar rahe ve jis mitti ki , apradh ki taqat par ,

shaheedon ke lahu se sinchi us mitti ki , Unse poori Kimat maango !
                                                                   
                                                                   Poonam shukla

Wednesday, January 11, 2012

Special on Uttarpradesh Election : 

न जांत न पांत ...न ही मूर्तियों की सौगातें ....हर समाज हर तबके के विकास की हो बातें
भयमुक्त समाज ...अपराधमुक्त गलियां......हर एक को मिले रोजी रोटी का साधन


उत्तरप्रदेश में चुनावी रणनीति तैयार हो रही है. क्या होना चाहिए उत्तरप्रदेश की भाषा . अपराध और मूर्तियों से कहीं दूर , ‘हिन्दी हिंटरलैंड’ कहे जाने वाले इस राज्य में अब वक़्त है जनता को ही राजनैतिक भाषा बदलने की. कब तक जांत पांत पर जनता भेढ़ बकरी की तरह जेहाँ हांकी जाए चली जायेगी , मानी जाती रहेगी....पर सवाल है इस चुनावी नौटंकी में जनता को अब खुद अपना हक चीख कर माँगने की...चलिए यह सवाल पूछें आपने नेताओं से....जानिये कौन यह भाषा बोल रहा है....

इकोनॉमिक फ्रीडम ऑफ द स्टेट्स ऑफ इंडिया 2011 की रिपोर्ट के आधार पर आर्थिक नीतियों की दृष्टि से देश के 20 राज्यों में तमिलनाडु सबसे अधिक आर्थिक स्वतंत्रता वाला राज्य है. रिपोर्ट में गुजरात दूसरे स्थान पर और आंध्र प्रदेश तीसरे स्थान पर है, जबकि उत्तरप्रदेश को १४ वां बिहार को 20वां, उत्तराखंड को 19वां और असम को 18वां स्थान प्राप्त हुआ. 

जीडीपी में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 2000 के 9.7 प्रतिशत से घटकर 2010 में 8.1 प्रतिशत रह गई है।

मानव विकास सूचकांक के मामले में सबसे पिछड़ा राज्य बिहार (0.367) है। बिहार के तुरंत बाद असम (0.386), उत्तरप्रदेश (0.388) और मध्यप्रदेश (0.394) का नंबर है। 

भयमुक्त समाज ...अपराधमुक्त गलियां..... 
कानून व्यवस्था के मामले में भी हालात इतने अच्छे नहीं हैं. हिंसक अपराधिक वारदातों में 2007 में देश का 12.4 % ( 26693 आउट ऑफ़ , 2,15,693) उत्तरप्रदेश से था. मर्डर केस में देश का 15.5 % ( 5000 out of 32318 ) उत्तरप्रदेश की भागीधारी थी. अपहरण के मामले में देश का 16.5 % केसेस उत्तरप्रदेश के थे. जहाँ देश में 125 पुलिस जवान है हर लाख जनसँख्या पर वहीँ उत्तरप्रदेश मैं या औसत 80 है और बिहार में सिर्फ 60 . राज्य की कानून व्यवस्था ... ....विकास बढेगा जब लोग सुरक्षित होंगे

राज्य में युवाओं को रोजगार मिले.....हर एक को मिले रोजी रोटी का साधन

कब तक राज्य के लोग बाहरी राज्यों के शहरों में पलायन करते रहेंगे और हमेशा बाहरी होने का लेबल लगाये मार सहते रहेंगे...कृषि उत्पादनों को सही कीमत मिले....किसानो को उपज पर सही लाभ हो ... .विदेशों में बसे भूमिपुत्रों के लिए निवेश की विशेष सुविधा... उद्योगों के लिए विशेष सहूलियतें .

राज्य में भूमिपुत्रों के लिए रोजगार के अवसर .....उद्योगों का विकास. ..निवेश के लिए प्रोत्साहन 

न जांत न पांत ...न ही मूर्तियों की सौगातें ....हर समाज हर तबके के विकास की हो बातें

देश के अन्य राज्यों की तुलना मैं गरीबी का स्तर काफी ज्यादा है. 1973-1974 में 57.4% से घट कर 2004-2005 में 32.8 % हो तो गयी पर देश का औसत 54.9% से घट कर 27.5 % हो गया था. 2004-2005 के आंकड़ों के अनुसार उत्तरप्रदेश में 60 लाख लोग गरीबे रेखा से नीचे है जो देश का 1/5 भाग है.

साक्षरता मैं राज्य 56.3% है जबकी केरला 90.9% , गोवा 82.०% , हिमाचल प्रदेश 76.5 % और तमिलनाडु 73.5 % हैं. 35 राज्यों और केंद्र शाशित प्रदेशों में उत्तरप्रदेश का स्थान 31 है. शिक्षा मामले में 2004 के एक सर्वे के अनुसार अन्य राज्यों केरला ( 2.96 स्कूल / गाँव , 416 छात्र /गाँव) , आँध्रप्रदेश ( 1.98स्कूल/गाँव , 186छात्र /गाँव) के मुकाबले उत्तरप्रदेश में 0.97 स्कूल/गाँव और 314 छात्र/गाँव थे.

हर गाँव में शाला हो……हर बच्चे को शिक्षा मिले.....राज्य पढ़े और आगे बढे
हमारी भाषा ....राज्य के विकास की भाषा....हर समाज का विकास , सबका विकास

Poonam Shukla.

Sunday, November 27, 2011

ज्योतिष , कर्म और पुरुषार्थ


ज्योतिष , कर्म और पुरुषार्थ

धन वैभव प्राप्ति के लिए मनुष्य अत्यंत प्रयत्नशील रहता है. आप पत्रिकायों और  टीवी चैनलों को देख लें तो हजारों तरीकों से ज्योतिष और धर्म शास्त्र का सहारा लेकर कई तरह के विधि-विधान और अनुष्ठान बताएं जा रहे हैं . कई तरह के मंत्र - यन्त्र से वैभव और धन प्राप्ति के अचूक उपाय दिए जा रहे हैं. 

 हर विधि विधान और मंत्र-यन्त्र की अपना महत्व और  लाभ है . सही , उचित और शास्त्रोक्त रीतियों के अनुसार किये जाने वाले अनुष्ठानो का महत्व है और मनुष्य लाभान्वित भी होता है . हमारे प्राचीन शास्त्रों ने इसका विधिवत उल्लेख किया है. पर यह बात बहुत आवश्यक है की जिस तरह इसे आज समाज में प्रस्तुत  किया जा रहा है क्या वह उचित और सही है और क्या हम सर्व प्रकार से प्राचीन ज्ञान को समाज में प्रस्तुत कर रहे हैं. हमारी संस्कृति , सभ्यता और  सनातन धर्म कर्म प्रधान रहा है .  ज्योतिष और वेदों में उल्लेखित उपाय या  अनुष्ठान  कोई इन्स्टंट नूडल बनाने के नुस्खे नहीं थे. 

धन , वैभव और ऐश्वर्य प्राप्ति  की हर कोई साधना करना चाहता है.  दीपावली  के इस पवित्र पर्व पर आवश्यक है हम धर्म , ज्योतिष और प्राचीन ज्ञान के सहारे सही तरीके समझे , जाने और उपयोग में लाये ताकि जीवन को सफल बनाया जा सके .

!! कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती  . करमूले तु गोविन्द: प्रभाते करदर्शनम् !!  हमारे हाथों में ही मां लक्ष्मी , मां सरस्वती और भगवान गोविन्द का निवास है .


यथार्थ में ज्योतिष का मूल रूप कर्म विधान पर आधारित है. कर्म-पूर्व जन्म का,कर्म-वर्तमान जीवन का एवं इसके आधार पर विश्लेषण की प्रक्रिया.साथ ही देश,काल एवं पात्र का सिद्धांत भी लागु होता है.ज्योतिष विज्ञानं हमारे कर्मो का ढांचा बताता है . यह हमारे भूत वर्तमान और भविष्य में एक कड़ी बनता है. कर्म चार प्रकार के होते है:

१- संचित : संचित कर्म समस्त पूर्व जनम के कर्मो का संगृहीत रूप है
२- प्रारब्ध : प्रारब्ध कर्म , संचित कर्म का वह भाग होता है जिसका हम भोग वर्तमान जनम में करने वाले है . इसी को भाग्य भी कहते है.
३- क्रियमाण : क्रियमाण कर्म वह कर्म है जो हम वर्तमान में करते है . क्रियमाण कर्म इश्वर प्रदत्त वह संकल्प शक्ति है, जो हमारे कई पूर्व जन्म के कर्मो के दुष्प्रभावों को समाप्त करने में सहायता करती है. उ
४- आगम : आगम कर्म वह नए कर्म है जो की हम भविष्य में करने वाले हैं.

कर्म  करना एक तरह से मानव जीवन की विवशता ही है, क्यों कि किए गए कर्मों से ही प्रारब्ध का निर्माण होता है. भाग्य पूर्व के संचित कर्मों तथा वर्तमान जीवन के किए गए कर्मों के मिश्रण का ही रहस्यमयी अंश है. इसलिए अधिकतर लोग अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता के चरम को छूने के लिए निरन्तर संघर्षशील रहते हैं, लेकिन इनमें से बहुत कम ही अपने सपनों को हकीकत में बदल पाते हैं. ऎसी मान्यता है कि प्रकृ्ति केवल योग्य "प्रारब्ध" का ही स्वागत करती है. यहाँ योग्य शब्द विज्ञान के किसी भी तर्क तथा मानव बुद्धि की सीमा से बाहर है. "योग्यता" के बीज कर्मफल में ही छिपे रहते हैं और इन बीजों में लुप्त रहते हैं मानव के पूर्व जन्मों के वे श्राप अथवा वरदान, जिन्हे अपनी चेतना में समेटे आत्मा इस शरीर में जन्म लेती है.

गीता में लिखा है : 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।  मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।

कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो ।इसका तात्पर्य है की मन की आप कर्म करते वक़्त परिणामों की चिंता न करें पर आलस्यपन और  अकर्मण्यता के शिकार न हो 

तुलसी यह तनु खेत है, मन बच कर्म किसान |
पाप पुण्य द्दै बीज हैं, बबै सो लवै निदान ||

तुलसीदास मनुष्य शरीर की तुलना खेती की जमीन से करते हैं . बुध्धि , वचन और कर्म किसान की भूमिका है  जहां अच्छे और बुरे कर्मों का पाप और पुण्य की तरह बीज बोने पर उसी तरह से फसल की प्राप्ति होती है .

नए भविष्य निर्माण के लिए सबसे पहला कदम है अपनी कमियों को समझ कर उन्हें दूर करने का प्रयास करना. हम जो भी करें, उसके लिए हमें शांत, संयमित होना चाहिए. साथ ही अपने कर्मों का सजग रह कर विश्लेषण भी करना चाहिए. अगर हम कमियों को हमेशा सही ही साबित करेंगे तो हम कभी भी अपने जीवन में उन्नति नहीं कर पायेंगे और न ही भविष्य को संवार पायेंगे. हमारे पूर्व जन्म के बुरे कर्मों ने ही वर्तमान की विषम परिस्थितियों को पैदा किया होता है और हमारे अन्दर नकारात्मक कर्मों के लिए प्रवृत्ति भी पैदा की होती है. यदि हम उस प्रवृत्ति में बहते जायेंगे तो भविष्य और बिगड़ता ही जाएगा. अतः सबसे महत्त्वपूर्ण कदम है अपनी कमियों को समझना. 

न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया.
ब्रह्मात्मकबोधेन मोक्षः सिद्धयति नान्यथा..

ग़ीता का सिद्धान्त अति संक्षेपसे यह है कि मनुष्यको निष्काम भावसे स्वकर्ममें प्रवृत्त रहकर चित्तशुद्धि करनी चाहिये। चित्तशुद्धिका उपाय ही फलाकंक्षाको छोड़कर कर्म करना है। जबतक चित्तशुद्धि न होगी, जिज्ञासा उत्पन्न नहीं हो सकती, बिना जिज्ञासा के मोक्षकी इच्छा ही असम्भव है।

आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्र्चद्यौर्भूमिरापो हॄदयं यमश्र्च  
अहश्र्च रात्रिश्र्च उभे च संध्ये धर्माेऽपि जानाति नरस्य वॄत्तम् ! महाभारत !

सूर्य , चन्द्र , वायु , अग्नि , आकाश , पृथ्वी , जल , हृदय , यम , सूर्योदय और सूर्यास्त और धर्म हमेशा   हमारे कार्यों को देखते रहते है और उसके साक्ष्य है 

षड् दोषा: पुरूषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता 
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध: आलस्यं दीर्घसूत्रता ! पंचतंत्र !

जो विश्व में समृधि पाना चाहते है , उन्हें छः दोषों से दूर रहना चाहिए : लम्बी निद्रा या अज्ञान- हमारे इर्द गिर्द क्या हो रहा है इसकी जानकारी न होना  , तन्द्रा ,भय , क्रोध , आलस्य और कंजूसी  . 

ज्योतिष  समय का विज्ञानं है . तिथि , वार, नक्षत्र , योग और कर्म इन पांच चीजों का अध्ययन कर भविष्य में होने वाली घटनायों का आकलन किया जाता है . संभावनायों  और भविष्यवाणी के बजाय ज्योतिष शास्त्र का सही उपयोग  परामर्श , मानव जीवन को अनुशासित  और जिंदगी के हर पल का एक समुचित मार्गदर्शन के साधन के तौर पर समाज में प्रस्तुत करने की अंत्यत आवश्यकता है . केवल भविष्यवाणियों में सिमित न रह कर , ज्योतिष का आधार लेकर मनुष्य की जीवन की कई समस्यायों का हल निकाला जा सकता है. ज्योतिष भविष्य को बदलता नहीं बल्कि मनुष्य को सही और उचित सलाह देता है .  प्रथम तो हमें यह समझ लेना चाहिए की ज्योतिष है क्या ? ज्योतिष प्रकाश का नाम है | प्रकाश अँधेरे को दूर करता है अँधेरा लाता नहीं | ज्योतिष कर्म को निश्चित करता है कर्म से भटकाता नहीं | ज्योतिष व्यर्थ के प्रयासों से बचते हुए सफलता के लिए मदद करता है व्यर्थ के कार्य नहीं करवाता है | वस्तुतः ज्योतिष हमें हमारे अन्तर्निहित शक्ति का ज्ञान करवाते हुए सही दिशा प्रदान करता है | 


दीपावली का पर्व हमें वैभव और यश की कामना का संकेत देता है. हम अर्थ प्राप्ति की इच्छा रखते हुए उपासना करते हैं मां महालक्ष्मी की. इस अवसर पर विधि विधान से मां महालक्ष्मी की स्तुति करते हुए ध्यान रखिये की मां लक्ष्मी की उत्पति भी एक संघर्ष से हुयी थी. मां लक्ष्मी की प्राप्ति समुद्र मंथन से हुयी थी.  दीपवाली का उत्सव हम भगवान् श्री राम और  मां सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या आने की ख़ुशी में मनाते हैं . रामायण की कथा भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पुरुषार्थ का उल्लेख करती है.  आज  दीपवाली में धन  , वैभव और समृधि की कामना करते हुए मां महालक्ष्मी की  विधिवत पूजन कर  नित अच्छे और कल्याणकारी कर्म करने का संकल्प करें. सफलता आपके कदम चूमेंगी .

पूनम शुक्ला  
http://astropoonamshukla.blogspot.com/p/blog-page.html

Saturday, November 19, 2011

अन्तराष्ट्रीय जगत से ....विश्व स्तर पर समाचार...On Global as International News-" Vishva Vani " - Nov 2011 . A publication of "World Brahman Organization" - - USA and widely circulated all over world 

E-मेल पर प्राप्त सन्देश from Nepal :Congratulation Poonam Ji alot frrom Nepal brahmin Sabha.
नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ .

झरोखों से झांकती इन आशायों भरी आँखों को इंतज़ार है अपने पापा का ,
महंगाई की मार में गायब हो गए , उनके थैले में आज क्या छिपा होगा ?
इस झिर्री से घूरती , इन मासूम आँखों में , एक डर हमेशा छिपा रहता है ,
ब्रेअकिंग न्यूज़ की गिनती में , उनके घर का मालिक न गिना होगा ?

" तुम कल देश के भविष्य हो " का भाषण देने वालों इन आखों में झाँक कर देखे ,
वह सिर्फ इस बात की चिंता में है..आज की रात का भविष्य क्या होगा !!
सरकारी आंकड़ों में खोये यह बचपन किस मजहब या जाति का है
शिक्षा , स्वास्थ्य और पोषण के किन योजनायों में इनका नाम आया होगा ?

याद रहे इतिहास ने गवाही दी है
Ballot और Bullet ..दोनों भाषायों में इसने अपनी खामोश जुबाने बोली हैं,
जब जब इन मासूम सी आँखों को इन सवालों का जवाब नहीं आया होगा !!!


Nanha Munna Rahi hun desh ka sipahi hun....

Jhraokhon se jhankati in aashayon bhari aankhon ko intezaar hai apne papa ka ,
Mahangai kee maar men gayab ho gaye , unke thaile men aaj kya chhipa hoga ?
is Jhirri se ghoorati , in masoom aankhon men , ek dar hamesha chhipa rahata hai ,
Breaking news kee Ginati men , unke ghar ka malik na gina hoga ?

" Tum Kal desh ke bhavishya ho " ka Bhashan dene walon in aakhon men jhaank kar dekhe ,
wah sirf is baat kee chinta men hai .aaj kee Raat ka bhavishya kya hoga !!
Sarkari Aankadon men khoye yah bachpan Kis Majhab ya jati ka hai
shiksa , Swasthya aur Poshan के kin yojanayon में inka naam aaya hoga ?

yaad rahe itihas ने gawahi dee hai
Ballot aur Bullet ..dono bhashayon men isnae apnee khamosh jubane boli hai,
jab jab in masoom see aankhon ko in swalon ka jawab nahi aaya hoga !!!

Poonam Shukla