Monday, July 2, 2012


यह मुठभेड़ फर्जी है या राजनीती और मानवाधिकार के नारे !!

शहीद वर्दियों का अपमान न करें ? 









छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के जंगलों में 28th जून देर रात सीआरपीएफ जवानों और नक्सलीयों के बीच जबर्दस्त मुठभेड़ हुई। इसमें 18 नक्सलीयों के मारे जाने की खबर मिली है। सीआरपीएफ के छह जवान गंभीर रूप से घायल हुए हैं। दंतेवाड़ा के इन जंगलों में रात को हुई यह मुठभेड़ करीब छह घंटे तक चली .छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सीआरपीएफ और नक्सलियों के बीच हुए एनकाउंटर पर अब केंद्र सरकार और राज्य सरकार के मंत्रियों के बीच राजनीतिक 'मुठभेड़' चल रही है। केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री चरणदास महंत ने कहा है कि यह मुठभेड़ फर्जी है ! हम कितनी आसानी से सुरक्षा बलों के मनोबल को तोड़ देते हैं और शहीदों के खून की राजनीती के गंदे खेल में हर पल उस शहादत को अपमानित करते हैं. आखिर क्यों ? 

क्यों हम खाकी पहने वाले इंसान को सिर्फ सूखे पत्तों के तरह मरने वाली चीज समझ लेते हैं . आपको यह बता दें की जिस जगह सुरक्षा बल ने यह एनकाउंटर किया वह उस चिंतलनार के बेहद करीब है, जहां अप्रैल 2010 में नक्सलीयों ने सुरक्षा बल के कैंप पर हमला कर 75 जवानों को मार दिया था। तो कहां थे मंत्री महोदय उस वक़्त जब ७५ वर्दियां लहूलुहान हो गयी थी ? किस देश भर के गलियों में में छुपे थे मानवाधिकार की चिल्लपों कर अपनी दुकान चलने वाले ठेकेदार और टीवी पर बहस करने वाले बुद्धिजीवी वर्ग ? तब क्यूँ नहीं नहीं बनाई गयी समितियां और मुठभेड़ की समीक्षा की गयी ? मुझे यह बहस नहीं करनी है की क्या सही हैं या गलत ! 

किसी निर्दोष के खून की वकालत कोई भी सभ्य समाज कभी नहीं कर सकता पर यहाँ मुद्दा कुछ और है ? किन वातावरण और बंदिशों में पुलिस का जवान मौत से लोहा लेता है उसे नज़रअंदाज कर उसके हर काम की निंदा करना आज के आधुनिक समाज का फैशन है. 

भारत के करीबन 12 राज्यों के लगभग 125 जिलों में नक्सल ने अपना कब्ज़ा सा बना लिया है. भारत के गृह सचिव जी के पिल्लई के अनुसार नक्सल सालाना $300 मिलियन यानी 1400 करोड़ रुपया की उगाही करते है . यह गरीबों एवं आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई का दिखावा कर रहे नक्सल के किस आर्थिक विकास अजेंडा है ? सरकार के ही आंकड़े यह बताते हैं की 1980 से अबतक लगभग 11575 लोग नक्सल आतंक का शिकार हुए हैं जिसमे 6377 नागरिक , 2285 सुरक्षा बल कर्मी और सिर्फ 2913 नक्सलवादी हैं. प्रश्न है की इन 9000 नागरिकों और जवानों की मौत का मानवाधिकार कौन देख रहा है. ? इतनी मौतों की कौन सी जाँच की जा रही है ? 1980 से लेकर आज तक कितने कदम उठाये गए हैं ? 

'बच्चे और सशस्त्र विरोध' नामक अपनी वार्षिक रपट में संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि नक्सली बच्चों को दस्ता बनाकर अपना दायरा विस्तृत कर रहे हैं.सशस्त्र नक्सली बच्चों की नियुक्ति करने के साथ ही उन्हें नक्सल आंदोलन के लिए बौद्धिक स्तर पर तैयार कर रहे हैं। बड़े स्तर पर अपने फैलाव के लिए नक्सली इन बच्चों का बाल दस्ता, बाल संघम और बाल मंडल बना रहे हैं. 

मानवाधिकार के बुद्धिजीवी क्या यह जानते है वर्षों से CRPF टुकड़ियाँ और पुलिस के जवान दंतेवाडा के बीहड़ जंगलों में बुनियादी नागरिक सुविधायों से दूर लगे हुए हैं और इस डर से की कब उनकी गाडी किस बारूदी सुरंग का शिकार हो जाए ? सरकार और नक्सल दोनों के बीच फंसे यह जवान बहनों की शादी , बुडी अम्मा की खांसी और अपने बड़ते बच्चों की मुस्कराहट के लिए तरसते हुए , अखबारों में नेताओं के भ्रष्ट काले कारनामें और बुद्धिजीवों की अनर्गल प्रलाप को भी जानते हुए इस लिए शहीद होने को तैयार हैं ताकि हम और आप काफी की चुस्कियां लेकर बहस कर सके. क्या इन सबका हल सिर्फ कानून और खाकी है ?

केंद्र सरकार नक्सल प्रभावित प्रत्येक जिले में विकास कार्यो के लिए अलग से प्रति वर्ष 55 करोड़ रूपए का अनुदान दे रही है . इनमें आदिवासी क्षेत्रों का संवेदनशील तरीके से विकास, पर्याप्त सुरक्षा बलों की तैनाती और राजनीतिक प्रक्रिया को मजबूत करना शामिल है.

जिस देश में सामाजिक रूप से अभी भी भारी विषमतायें हैं. 40 % जनसंख्या भी अनपढ़ हैं . 43 % बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. 42% आबादी गरीबी रेखा के नीचे है सार्वजनिक वितरण प्रणाली आधी आबादी तक नहीं पहुँच पा रहे है. भ्रस्टाचार से त्रस्त होकर देश के युवक बेकारी और हताशा के शिकार हो रहे हैं. देश के विकास कार्यों और योजनायों का लाभ जनता तक पहुँच ही नहीं पा रहा है जो आक्रोश को पैदा कर रहा है. 

कमरों में बैठकर नीति बनाने और बहस करने से बहुत अलग स्थिति गोलियों का सामना करनेवाले सुरक्षाबलों को झेलनी पड़ती है. राजनैतिक दलों के पास विकास का मुद्दा सिर्फ नारों में वोटों के लिए रहा गया है . जांत पांत , धर्म और सामाजिक संबधों में दरार की राजनीती खेल कर सत्ता के गलियारों में पहुँचने वाले नेताओं , आपराधियों के सहारे वोट बटोर कर कुर्सी हथियाने वाले और आये दिन घोटालों की समाचारों में महंगाई से परेशान जनता ...क्या इन सबका हल सिर्फ कानून और खाकी है ? क्या नक्सल समस्या का हल , विकास के नाम पर आबंटित हो रहे करोड़ों के फंड भ्रस्टाचार का शिकार तो नहीं हो रहे हैं ? क्या नक्सल समस्या का जीवित रहना राजनीती शतरंज की बिसात का असली मुद्दा तो नहीं है ? 

यह सभी स्वीकार करते हैं की विकास और आर्थिक समृधि ही नक्सल का हल निकाल सकती है. पर 2010 के एक सर्वे के अनुसार हमारी नारेबाजी और जवानों के शहीद होने पर घडियाली आंसू बहाने वाली सरकार और चाक चौबंद हो जाने का दावा करने वाला असहाय प्रशासन , की कारगुजारी चौकाने वाली है . 2006 के वन मान्यता कानून के तहत आदिवासियों को वन जमीन के आबंटन में ढिलाई बरती गयी . बिहार में मात्र एक तिहाई अधिकारों का निपटारा हुआ . नक्सल की जबरदस्त मार झेल रहे झारखण्ड में यह केवल 15 % ही था. कांकेर - छत्तीसगढ़ जहाँ आयेदिन नक्सल मुठमेड की खबरें आती रहती है , में 60 % जनसँख्या पिछड़े वर्ग की है. इसके बावजूद ग्रामीण रोजगार योजना का सिर्फ 5% बजट क्रियान्वित किया जा सका. यह सिर्फ कुछ उदहारण है. 

विकास योजनायों की हालत , विस्थापित एवं पुनर्वास जैसे गंभीर विषयों में उदासीन सरकार और भ्रस्टाचार में लिप्त राजनैतिक ढांचा ...क्या सिर्फ बंद हाथों में दिए गए हथियारों के बल पर ही नक्सल का हल खोजा जाएगा . 

आवश्यकता है एक सशक्त राजैतिक इच्छा शक्ति की, एक प्रभावशाली और सक्षम नेतृत्व की ,और संकल्प के साथ विकास और योजनायों को आदिवासियों के घर तक पहुंचाने की. शायद हम ऊँचे फ्लायोवर , मेट्रो रेल प्रोजेक्ट , छः आठ लेन वाले एक्सप्रेस वे में कहीं विकास ढूँढने लगे है और यह भूल गए है की भारत की ७०% से अधिक आबादी इन सबसे कहीं दूर दैनिक जीवन यापन की कशमकश में है. 

यदि शहरों को सुरक्षित रखना है तो इन सुदूर गावों और जंगलो में बसे लोगों को भी उनके माहौल में सुखी रखना होगा..क्यूंकि याद रहे ...शहर का विकास , इनके ही मुंह का कौर छीनकर , इन्हें ही विस्थापित कर , इन्ही की संसधानो की डकैती कर किया जा रहा है . 

सिर्फ कुछ और लहूलुहान होती खाकी वर्दियों की गिनती भर कर लेने से इस सामजिक समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता . यदि लड़ना है तो सरकार की उस वयवस्था से लड़ा जाए जो इन विकास को रोक रखे है . यदि आवाज उठानी है तो वहां उठायें जहाँ नीतियां और योजनायें बनाई जा रही है . यदि नष्ट करना है तो भ्रस्टाचार और सुस्त प्रणाली को नष्ट करें ....हथियारों से प्रश्न नहीं सुलझते . 

पर सवाल यह है की विगत 44 सालों से इस समस्या पर बहस हो रही है. हथियारों और वोट बैंक पर टिकी कुर्सियों के सौदागर इसका हल निकालना चाहेंगे या गोलियों से छलनी वर्दियों पर काफी की चुस्की ले रहे मानवाधिकार की दुकान चला रहे लोग इस समस्या की जड़ तक जाना चाहेंगे ???

By Poonam Shukla (पूनम शुक्ला )

Sunday, July 1, 2012


कांपते हुए लफ़्ज़ों का गीलापन छुपा नहीं सके ख़त में ,तुम मुस्कराहट भेजते हो ,और हम आंसू पढ़ लेते हैं
हमने सीख ली नदियों से,लहरों का पर्दा-दारी में बहना, ऊपर से हँसते रहते हैं , पर गहराई में हम रो लेते हैं
यह शहर भी अजीब है ,भाग दौड़ में खो जाते हैं मेरे दोस्त ,चंद लम्हों के लिए कई लम्हों का हिसाब करते है
पर उनकी मजबूरियों की मासूम उदासी की शोख अदाएं, मिलने के कुछ हसीन पल , बहलते हम खो लेते हैं .

poonam shukla


बिकती नैतिकता , भ्रस्टाचार की नौटंकी ,और कुर्सियों की खरीद से दूर में एक इमानदार बनूँगा !
लाचार संविधान , बेबस प्रशासन और गुलाम होते कानून का मैं एक सशक्त पहरेदार बनूँगा !!
हर गरीब की आस , हर भूखे की रोटी , उनके विकास का मजबूत ; मैं वह हिस्सेदार बनूँगा !
भले न देखी हो आजादी की जंग , पर शहीदों के लहू का क़र्ज़ चुकाता मैं सच्चा कर्जदार बनूँगा !!

सरकारी फाईलों और दफतरों की सीडीयों पर दम तोड़ती जनता का मैं एक सबल आधार बनूँगा !
नारों और राजनीती की चमक में बहकता कदम न बनकर , मैं खुद देश का एक समाचार बनूँगा !
लड़ सके इस व्यवस्था से और दिला सके न्याय , कमजोरों के लिए वोह ताक़तवर हथियार बनूँगा
टूटी छत ,अँधेरी रातें ,कम होती खुराक के बावजूद , मेहनत से , उन उंचाईयों का मैं हक़दार बनूँगा !

हम एवं समाज पर यह एक जिम्मेदारी है की यह लोग नक्सलियों और अपराधियों का हथियार न बने.. "
Poonam Shukla

Sunday, June 17, 2012


"" मैं भारत की तस्वीर हूँ ,कल के भारत के भविष्य की जननी हूँ ,
आँचल में दूध और आँखों में पानी , अब यह मेरी जुबान नहीं हैं .
"जय माता दी " चिल्लाने वालों मेरी आँखों में झांक कर देखो ,
मैं वही शक्ति हूँ , मुझे जीने दो !!
मैं अग्निपरीक्षा की सीता और जुए में हारी द्रौपदी नहीं हूँ,
पुरुष के अहंकार की गाली का हर शब्द अब मैं नहीं हूँ ,
मैं समाज का स्वाभिमान बनना चाहती हूँ , हर परिवार की शान बनना चाहती हूँ

हाँ ! मैं नारी हूँ
पर समाज की कमजोरियां नहीं हूँ मैं , मुझे जीने दे सके वह भगवान् चाहती हूँ ,
हाँ मैं नारी हूँ ,
पर बन्धनों से अलग कर सबला बना सके मुझे ,ऐसा मैं इंसान चाहती हूँ .
मुझे मेरी जीने की साँसे ना छीनो , मैं भी बढ़ने के लिए अपने हक का आसमान चाहती हूँ ."""

ऐसा अंदाज़ है के पिछले 30 सालों में 1.2Cr लड़कियों की मृत्यु जनम से पहले ही कर दी गयी .हर 12 seconds में भारत में कहीं न कहीं एक भ्रूण कन्या को ख़त्म कर दिया जाता है .15 Lakh लड़कियां ( 1.2 cr से ) यानि 13% अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाती. बाकि बचे लोगों में सिर्फ 90 lakh लड़कियां ही 15th जन्मदिन मनाती हैं .

23 Lakh वेश्याओं में 12 lakh -- करीबन 50% लड़कियां कम उम्र की हैं, 12000 बच्चों के सर्वेक्षण में 69% बच्चों ने किसी न किस प्रकार के यौन शोषण की बात स्वीकारी है . Year 2000 survey के अनुसार 51 lakh बंधुआ मजदूर हैं जिसमे 18 lakh वेश्यावृति में थी और 12 लाख लड़कियां देह तस्करी में शामिल की गयी 


Poonam Shukla
आंकड़ों के खेल में व्यस्त है देश के नेता , इस गणित के घटा जोड़ में उलझ गया है मेरा देश !
चुनाव हो या राष्ट्रपति , इन आंकड़ों के बदलते हर गुणा-भाग में फँस गया है मेरा देश !!!
विकास के आंकड़े कब का भूल गए , योजनायों के गणित फाईलों में खो गए ,
कुर्सियों की पाठशाला है , यहाँ के गठजोड़ो की गणित में "शुन्य" हो गया है मेरा देश !!!!


Saturday, May 5, 2012


मैं खोज रही हूँ " उसको" जो हर जगह व्याप्त है , पर खोज न पायी.
धर्मगुरुयों के द्वार खडी चीखती चिलायी , पर "उसे" खोज न पायी.

धर्मस्थलों की सीढ़ियों पर , व्यवसाव को फैलते देखा.
धर्म के ठेकेदारों को धर्म के नाम पर लूटते देखा .
बड़े बड़े भंडारे देखे , बड़े बड़े अनुष्ठान देखें
वहीँ किसी कोने पर लोगों को दाने दाने पर मरते देखा .

तर्कों में , प्रवचनों में , पाठों में , कृपाओं में ढूंढती रही ,
फिर भी दरबारों में , शिविरों में , "उसे " खोज न पायी.

हर ह्रदय में वह रहता है, पर हर ह्रदय को सिकुड़ता देखा
हर पुण्यों में वह मिलता है , पर हर पाप को बढ़ते देखा
हर जुबान उसकी है , पर हर जुबान को जहर उगलते देखा
हर कण कण में रहनेवाला वह , पर लोगों को भटकते देखा

हर इंसान में बसता है वोह , पर वहां भी उसे खोज न पायी
इस इंसानी बस्ती में , एक अदद इंसान भी खोज न पायी.

Poonam Shukla.
(यह भावनात्मक कविता सामाजिक स्तर पर है. किसी भी धर्म , धर्मगुरु या धर्मस्थल से संबधित नहीं हैं .The poem is on social subjects and does not indicate any specific religion, religious leader/person and Religious place.चित्र केवल साहित्यिक प्रतीकात्मक है .Image is only literary representation)

Sunday, March 11, 2012

Leadership : Rahul Vs Akhilesh :उत्तरप्रदेश चुनाव का नेतृत्व विश्लेषण


"We are not friends, we are just political acquaintances.हम  दोस्त नहीं  है   हम   सिर्फ राजनैतिक परिचित हैं " by Akhilesh on Rahul  while UP byelection Firozabad after defeat of His Wife

कुछ  महीनो पहले  उत्तरप्रदेश में हुए उपचुनाव में   राहुल  गाँधी द्वारा किये गए कांग्रेस प्रचार और कांग्रेस की वापसी का प्रतीक माने जाने वाले  इस उपचुनाव के  नतीजे में अपनी पत्नी डिम्पल   की करारी हार    के बाद  अखिलेश  यादव  ने  युध्ध की  घोषणा कर दी थी .... यह शुरुवात थी  " अखिलेश यादव विरुद्ध  राहुल गाँधी " के महाभारत की जो शायद तब राजनीती के जानकार भी नहीं समझ नहीं पाए . इस करारी शिकस्त ने अखिलेश को मानो बदल दिया हो   और  एक  आग  उनके  मन में लगी हो .


राहुल और अखिलेश :  दोनों ही आधुनिक भारत के यूथ ब्रिगेड , भारत की राजनैतिक विरासत में जन्मे और पले हुए , एक  कांग्रेस के राजकुमार  तो दुसरे समाजवादी पार्टी के युवराज , दोनों ही  उत्तरप्रदेश से सांसद . दोनों के हाथों उनकी पार्टियों के  चुनाव प्रचार की बागडोर . दोनों पर उनके पार्टी नेताओं का विश्वास  और प्रचार में खुली छूट .

अखिलेश की तरह ही राहुल ने अपने पार्टी के चुनाव प्रचार के नेतृत्व  आगे आ कर किया . कई विषम परिस्थितियों में , 22  साल से टूटी , लुप्त हुयी और सत्ता से दूर रही पार्टी को संभाला . उन्होंने भी काफी मेहनत की  200  से ज्यादा मीटिंग्स और दिन रात की यात्राएँ.  

अखिलेश , एक "अपने ही मोहल्ले गल्ली का बच्चा " का रूप लिए जेहां भी गए , और जब से Sept 2011 से उन्होंने साइकिल यात्रा शुरू की , सक्रिय युवकों की भीड़ उन्हें " भैया " कहते हुए जुटने और उमड़ने लगी. अखिलेश ने भले ही अपने भाषणों से कोई आग ना उगली हो  या पंच लाइन नहीं दी हो , लेकिन वे लोगों के हुजूम के बीच रहे , युवको से जिस तरह मिले , उनसे एक अपनापन रिश्ता सा बनाने लगे और उनके साथ पल बिताये , समाजवादी पार्टी की लहर सी बनने लगी .

अखिलेश ने सबसे प्रभावशाली अभियान का संचालन किया था . नियंत्रित पर अति सशक्त . उन्होंने विवेक पर निर्भरता रखी बजाये  भावनायों में बहने के. उन्होंने अपमानजनक या अपघर्षक शब्दों का प्रयोग नहीं किया . राहुल के किसी बी ग्रेड फिल्म की याद दिला देने वाले तमाशे के बिलकुल विपरीत प्रभावशाली प्रर्दशन करते रहे.   उन्होंने  D P यादव को पार्टी में शामिल करने का खुल कर  ; पर बिना क्रोध या अनियंत्रित  विरोध दिखा कर अपने प्रभाव को जाता दिया . उन्होंने किसी वोट  बैंक या आरक्षण को भी खुश करने में वक़्त बर्बाद नहीं किया . 

राहुल के   राष्ट्रीय व्यक्तित्व  की  छवि के  सीधे विपरीत अखिलेश ने जमीन से  जुड़े  होने की छवि का निर्माण किया . राहुल के नकारात्मक प्रचार  जो अधिकतर मायावती सरकार की बुराईयों और अन्याय पर निशाना  भर   था  , अखिलेश ने विकास के मुद्दों पर जोर देते  हुए " मुफ्त लैपटॉप" की बातें कर उत्तरप्रदेश की जनता में चुनावी वातावरण  को नया आयाम , नयी हवा देने की सफल कोशिश की .

भारी सुरक्षा घेरे में बंधे राहुल  , लकड़ी की बाड़ के उस पार जुटे  दर्शकों और भीड़ को मंत्रमुग्ध तो कर देते हैं  पर मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश बिना किसी ढोंग के अपनी  छवि  जनता के बीच उन्ही के गल्ली-मोहल्ले का बच्चा होने की बना लेते हैं  

राहुल में पूरे उत्तरप्रदेश में  भारी जुटी भीड़ को संबोधित करते हुए एक उल्लेखनीय इमानदारी  के कमी दिखाई देती है , जबकि दूसरी तरफ , अखिलेश यादव विनम्र, मिलनसार , पार्टी के बड़े और पुराने लोगों को हाथ जोड़ कर नमस्ते करते हुए नज़र आते हैं  पार्टी कार्यक्रतायों को उनके नाम से   अदभुत प्रवाह से संबोधित करते रहे हैं. राहुल हमेशा यह जताते रहे की उत्तरप्रदेश उनके लिए महत्वपूर्ण है और उनके सोच में हैं और वे दलितों की बस्तियों और झोपड़ियों में रात बसेरा करते रहे वहीँ अखिलेश दूर से बने चबूतरों से कभी नहीं बोले , सुरक्षा घेरे से कभी बंधे नहीं रहे और तेज़ चाल से नीचे उतर कर दर्शकों की भीड़ में जा घुसते रहे .

राहुल का प्रचार अभियान इतने सावधानीपूर्वक  बुना और रचा गया था की वे  अभियान की  सहजता और आकर्षण खो चुके थे . इस अभियान कार्यकर्म में कोई मुख्य उद्देश्य नहीं था जो प्रचार के अंतिम पल तक टिका रहता . विभिन्न और कई बार  विरोधाभाषी  विचार , भटके हुए आवेगों से  चुनाव अभियान प्रभावित हुआ . कई बार ऐसा लगने लगा था किसी भी तरह के मज़बूत आधार के अनुपस्थित होने की वज़ह से फोटो या टीवी कैमरों में आने के लिए कुछ हरकतों पर निर्भरता होने लगी है .

राहुल की आत्म धारणा थी की वे एक  सच्चे , जमीन से जुड़े राजनैतिक नेता है , जो कठिन विषयों पर भी बातें करते हैं , जमीनी समस्याओं को जान लेते हैं , सही समय पर कार्यवाई भी करते हैं . हवाई बातें और ऊँची आसमानी सपने दिखने वाले टेलीविजन कैमरों और पत्रकारों ने उन्हें हिंदी भाषी राज्य का महानायक बनाना शुरू कर दी . इन्ही भीड़ को राहुल  के दृष्टिभार्म ने  अपना वोटर मान लिया .

यह अब लगने लगा था की कांग्रेस का मुख्य चुनाव प्रचारक  और पार्टी का चेहरा एक हवा के बुलबुला सा हो रहा हैं , वास्तविकता के कठोर हवायों से काफी अलग और दूर........उन्हें तो यह भी नहीं पता चला  की , उनका प्रभाव  असल में  किसी भी छेत्र में चाहे  निजी या सार्वज़निक , व्यक्तिगत या राजनैतिक ,....  मार्मिकता और करुणा की वज़ह से उपज रहा है ; जो  उनके और उनके परिवार को हर चीज़ में सहायता करता रहा है .
एक बेटी अपने मां के गालों  की चुटकी ले रही है , मेंडक के ऊपर बहिन का मजाक हो रहा है  शायद यह अहसास जताते हुए की उनके भाई एक खूबसूरत  राजकुमार हैं , एक पूरा  परिवार जो  चुनाव अभियान के  पिकनिक भ्रमण बच्चों सहित निकला है , बच्चो की मासूम तस्वीरें दिखाई जा रही हैं , और साले साहेब के इंटरवीयू  लिए जा रहे हैं , .......जो नहीं जानना चाहते उन्हें उनसे भी  ज्यादा जानकारी दी जा रही है ... यही राहुल के राजनीति अभियान के अलंकरण और आभूषण थे ....पता नहीं , जनता को किस राजनीती की संकेत दिए जा रहे थे और क्या बताना चाहते थे ???

अखिलेश ने समाजवादी पार्टी की सोच को नयी दिशा दी .  जातिगत विचारधारा को परिवर्तित करते हुए , मानव विकास के सभी पैमानों पर पिछड़े और  देश के सबसे अधिक जनसँख्या वाले राज्य के युवको की आकान्छायों और सपनो से आपने आप को और पार्टी को जोड़ा . अखिलेश ने  9000 KMs  कम से ज्यादा   यात्रायें की .उत्तरप्रदेश की तंग धूलभरी गललियों में साइकिल की से ..राज्य की 403 विधानसभा छेत्रों में 250 छेत्रों का  स्वंय  दौरा किया .....लोगों से अपने संपर्क बढाये......बड़े धैर्य से लाठीचार्ज को भी झेला .....चापलूसी और चिकनी चुपड़ी बातों को सरलता से लिया ...मंच पर  नीचे से फेंके जाने वाले गेंदे फूल की मालायों के लिए भी अपना सर उन्होंने झुकाया . अपने पार्टी कार्यकर्तायों के नाम से बुलाते रहे और उन्हें अपने   साथ दौरों पर बस में भी बैठाते रहे .उनके भाषण संक्षेप , रोचक और ओजस्वी रहे. उन्होंने मायावती की बुराईयों को भी , कहीं कहीं हास्य का सहारा लेते हुए जिक्र किया विगत 6 महोनों में 800 से ज्यादा रैल्लियाँ की. 

जहाँ राहुल गाँधी  one man show  थे..... कांग्रेस पार्टी की अन्दूरनी  संगठन व्यवस्था कमज़ोर थी और आपसी खींचातानी और आंतरिक विरोधों का सामना करना पड़ा हमेशा केंद्रीय और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के झुण्ड से घिरे रहे या उनके व्यूह में फंसे रहे..अखिलेश ने  राज्य की मिटटी में चल कर लोगों से अपना संबध बनाते रहे ...एक नए सोच और एक नयी दिशा की आशा की किरण लोगों में जगाते हुए ....



poonam shukla

Saturday, February 11, 2012


रैलियों और भाषणों में , जांत-पांत और धर्म के अलगाव पर खेली जाती घिनौनी राजनीती में,
चुनावी रणनीति और वादों के जाल में , मेरे विकास , शिक्षा और स्वास्थ्य की बातों को याद रखना !!!!

" वोट " का हथियार तुम्हारे हाथ है ...उनके बहते आँसुयों में न बहलो , मेरी आँखों में झांक कर देखो
शहीदों का क़र्ज़ है तुम पर , उनके और मेरे उस "भारत" के उन अधूरे सपनो को याद रखना !!!!!

poonam shukla

Railiyon aur bhashanon men , Jaant- Paant aur Dharm ke algaav par kheli jaati ghinauni Rajneeti men :
Chunavi rananeeti aur vadon ke jal men , mere vikas , shiksha aur swasthya kee baton ko yaad rakhana !!!!

" VOTE" ka hathiyaar tumahare pass hai ...unke bahate aasyuon men na bahalo , meri aankhon men jhaank kar dekho,
Shaheedon ka karz hai tum par , unke aur mere us Bharat ke un adhoore sapno ko yaad rakhana !!!!

‎"ए मेरे देश -- ए रहबरे- मुल्क


‎"ए मेरे देश -- ए रहबरे- मुल्क ,
मासूमियत सी इन मुस्कानों में , कल के सपने लिए इन आँखों में ,
एक बार झांक कर तो देखो ....जिसमें एक क्रांति की पुकार है....
सुप्त हुयी हमारी मानसिकता और ठन्डे हुए लहू को ललकार है.."
ए मेरे देश ,..

मुल्क के हर वाशिंदों में , हर दरजे में , हर आखों में निराशा देखा .
देश के सत्ताशिखर पर प्रजातंत्र के नाम पर ,हो रहा तमाशा देखा .
लुप्त होती नैतिकता , खत्म हुई मानवता ,बिकता इमानो-धर्म
हर किसी को धर्म और छेत्र के नाम पर ,हर एक के लहू का प्यासा देखा .

आज .....
मेरे देश के हर सवाल पर , यह रहबरे , मुल्क क्यों मौन सा है ?
अखबारों की काली सुर्ख़ियों में ;सहमा सिमटा यह देश कौन सा है ?

यह में क्या देखती हूँ .......
भयभीत चेहरों के बंद होठों की जुबान ,उजरीं हुई बस्तियां और जलते हुये मकान
खरोंचों से भरी देह लिए बहना की दास्तान ,क्या येही है ,मेरा वो प्यारा हिंदुस्तान .

केस की फाईलों से पटी अदालतें , न्याय क्यों इतना गूंगा बेहरा है ?
क्या मायने हैं आज़ादी के ,क्या गुलामी का जख्म इतना गहरा है ?
राजनीति की देहलीज़ पर दम तोड़ता प्रशासन ,
हर विकास , हर योजना , हर दफ्तर पर ,भ्रष्टाचार का पहरा है .

उन मासूम चेहरों को देखो जिन्होंने ने मौत को देखा है ,
जा कर पूछ रोती बहना से ,जिसने इंसानी वेश में हैवान देखा है .
क्या तेरी रगों में बहता नहीं , सुभाष , भगत, राणा और शिवाजी का खून ,
या फिर तुने कौन सा और कैसा हिंदुस्तान देखा है ?

नहीं देखी गज़नी और चंगेज़ की लूट ,तो अपने ही नेताओं द्वारा लूटता हिंदुस्तान देख
न सूनी नादिर के हमले , तो दंगों और आतंक से तड़पता हिंदुस्तान देख .
याद नहीं विभाजन की काली रातें , वोह गुलामी के काले दिन ,
तो गरीबी , भूखमरी और बेकारी से ; कराहता हिंदुस्तान देख .

यदि चाहिए वह देश ; तो हर कतरे मैं खून का उबाल चाहिए ,
गंगा कावेरी के मौजों से ; उछलता चीखता इन्कलाब चाहिए ,
हिमालय को पिघलाता , हिंद्सागर से उफानता
हर गली -कुचे मैं क्रांति का एलान चाहिए

आज़ादी मिली तो भी क्या , आज़ादी की जंग अभी भी जारी है
बाहरी ताकतों से कहीं ; ज्यादा अन्दूरनी खतरा भारी है
मंजिल अभी दूर है , रास्ता बहुत ही मुस्किल ,
उठ , अर्जुन ! उठा गांडीव ..देर न कर ..विश्राम की नहीं बारी है

बहुत हो गया ये तमाशा , अब मत फंसों
भ्रस्त और कुटील नेताओं के इन झूठे नारों में .
प्रगती के वादे थोथें हैं …...यह कुर्सियों की नौटंकी है ,
उठ ..आग लगा दो गन्दी राजनीती की इन दीवारों में

गीता के श्लोक तेरे गीत हों , कुरान तेरी जुबान हो ,
हर मुठ्ठियों में चेतना आये ,
उठे क्रांति हर बस्ती , हर गलियारों में .

"ए मेरे देश -- ए रहबरे- मुल्क ,
मासूमियत सी इन मुस्कानों में , कल के सपने लिए इन आँखों में ,
एक बार झांक कर तो देखो ....जिसमें एक क्रांति की पुकार है....
सुप्त हुयी हमारी मानसिकता और ठन्डे हुए लहू को ललकार है...."

Poonam Shukla

Let the Mashal of Kranti spreads

भ्रष्ट- तंत्र में हुई मैली सफ़ेद खादी है , पर तुम हरी खाकी वर्दियों का "गर्व" बनाये रखना !
अपराध और कुर्सियों के गठजोड़ में , निर्बलों - असहायों को ताक़त दिलाये रखना !
सत्ता के लालच में बिकते जमीरों के बाज़ार में , " संविधान" के मूल्यों को बचाए रखना !
मेहंदी लगे इन हाथों में , देश के लिए , मां दुर्गा और काली की ज्वाला को जलाये रखना !!

bhrast - Tantra men huyee maili safed khadi hai , par tum Hari Khaki vardiyon ka garv banaye rakhana !
apradh aur kursiyon ke gathjod men , nirbalon - asahayon ko taqat dilaye rakhana !
satta ke lalach men Bikate jameeron ke baazar me , sanvidhan ke mulyon ko bachaye rakhana !
mehandi lage in hathon me, Desh ke liye , maan Durga aur Kaali kee jwala ko jalaye rakhana !!

Poonam Shukla